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आपातकाल के दौरान इंदिरा का विरोध करने वाले जयप्रकाश नारायण की जीवनी और उनके संघर्ष Biography of Jayprakash Narayan who opposed Indira Gandhi during Emergency in India

एकता में अनेकता वाले लोकतांत्रिक देश भारत में जब भी कभी लोकतंत्र पर किसी तरह के खतरे की आशंका हुई है तब तक देश में बड़ी बड़ी क्रांतियां हुई है और लोकतंत्र को खतरों से मुक्त कराया गया है।
और ऐसे खतरों से लड़ने के लिए कई महान सपूत इस पावन धरती पर अवतरित हुए इसी में से एक थे जय प्रकाश नारायण जिन्होंने इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल को एक लोकतांत्रिक खतरा बताया और सरकार के फैसले का खुलकर विरोध किया।

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1903 को सारण जिले के सिताबदियारा नामक गांव में हुआ था जो घाघरा नदी के तट पर स्थित था जो हमेशा बाढ़ की चपेट में रहता था।

इसी वजह से जय प्रकाश नारायण का परिवार वहां से हटकर कुछ दूर आगे चला गया स्थान अप उत्तर प्रदेश में आता है।

जयप्रकाश नारायण की रुचि बचपन से ही पढ़ने लिखने में थी जब जयप्रकाश नारायण मात्र 9 वर्ष के थे तब वे पटना आए और सातवीं कक्षा में अपना दाखिला कराया।

मत 9वर्ष की आयु में जयप्रकाश नारायण उस समय की प्रसिद्ध पत्रिकाएं सरस्वती, प्रभा और प्रताप को पढ़ना शुरू कर दिए थे।

पटना में अध्ययन के दौरान उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र और मैथिलीशरण गुप्त जैसे बड़े लेखकों की रचनाओं को पढ़ना शुरू कर दिया और उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता के श्री कृष्ण के अनमोल वचनों का अध्ययन किया।
सन 1918 जय प्रकाश नारायण ने अपनी स्कूली शिक्षा समाप्त की और इन्हें स्टेट पब्लिक मैट्रिकुलेशन एग्जामिनेशन का सर्टिफिकेट दिया गया।

जब जयप्रकाश नारायण मात्र 18 साल के थे तभी उनका विवाह बृज किशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती से हो गया प्रभावती उस समय मात्र 14 साल की थी।

विवाह के बाद जय प्रकाश नारायण पटना में रहने लगे क्योंकि वह पटना में ही कार्य कर थे जिसकी वजह से पत्नी के साथ रहना उनके लिए संभव नहीं था।

उसी दौरान महात्मा गांधी ने उनकी पत्नी को न्योता दिया और में महात्मा गांधी के आश्रम में सेवा करने लगी।
महात्मा गांधी ने उसी दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जारी किए गए रौलट एक्ट के खिलाफ असहयोग आंदोलन कर रहे थे इस आंदोलन में मौलाना आजाद ने एक बेहद शानदार भाषण दिया जिससे लोग प्रभावित हो गए।

जयप्रकाश नारायण मौलाना आजाद के तर्कों से काफी प्रभावित हुए जिसमें मौलाना आजाद ने लोगों से अंग्रेजी हुकूमत की शिक्षा को त्यागने का आग्रह किया था जयप्रकाश नारायण आंदोलन से लौटकर पटना आए और उस समय उनकी परीक्षा मात्र 20 दिन बची थी और उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया तथा बाद में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद द्वारा स्थापित कॉलेज बिहार विद्यापीठ में अपना दाखिला कराया।

बिहार विद्यापीठ से पढ़ाई पूरी करने के बाद जयप्रकाश नारायण ने अमेरिका से शिक्षा प्राप्त करने की ठानी और मात्र 20 वर्ष की आयु में वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका रवाना हो गए।
जयप्रकाश नारायण 8 अक्टूबर 1922 को कैलिफोर्निया पहुंच गए लेकिन उनका दाखिला जनवरी 1923 में बर्कले विश्वविद्यालय में हुआ।

जयप्रकाश नारायण के पास अपनी फीस चुकाने के लिए पैसे नहीं थे और उन्हें किसी प्रकार की कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली थी इसलिए जय प्रकाश नारायण ने एक मिल फैक्ट्री मैं काम करना शुरू कर दिया इसके साथ उन्होंने होटलों में बर्तन धोने का काम और गैरेज में गाड़ी बनाने का भी कार्य किया।
बावजूद इसके उन्हें शिक्षा में काफी कठिनाई आई क्योंकि बर्कली की फीस दोगुनी बढ़ा दी गई थी जिसके बाद इन्हें बर्कली विश्वविद्यालय छोड़कर यूनिवर्सिटी आफ लोया में अपना दाखिला कराना पड़ा।

पढ़ाई करते समय है मार्क्स के दास कैपिटल पढ़ने का मौका मिला। इसी समय इन्हें रूस क्रांति की के सफलता की खबर मिली और जयप्रकाश नारायण इससे काफी प्रभावित हुए।

सन 1929 में जयप्रकाश नारायण अमेरिका से उच्च शिक्षा प्राप्त करके भारत वापस आ गए उस दौरान उनकी पूरी विचारधाराएं मार्क्सवादी हो गई थी और भारत आकर उन्होंने राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी जॉइन कर लिया।

जब सन 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ था उस समय ब्रिटिश हुकूमत ने इन्हें जेल में डाल दिया जेल में इनकी मुलाकात प्रखर राष्ट्रवादी और समाजवादी राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन अशोक मेहता युसूफ देसाई सीके नारायण स्वामी पवन सिंहा मीनू मस्तानी तथा और कई राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से मुलाकात हुई। इस मुलाकात की वजह से कांग्रेसमें एक वामपंथी दल का निर्माण हुआ इसे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गया जिसके अध्यक्ष आचार्य नरेंद्र देव और महासचिव जयप्रकाश नारायण थे।

भारत छोड़ो आंदोलन के समय सन 1942 में इन नेताओं को गिरफ्तार किया गया और हजारीबाग के जेल में रखा गया इस दौरान जयप्रकाश नारायण अपने साथियों सूरज नारायण सिंह गुलाब चंद गुप्ता राम आसरे मिश्रा शालिग्राम सिंह योगेंद्र शुक्ला आदि से मिलकर देश की आजादी के लिए आंदोलन की योजनाएं बनाने लगे।

जयप्रकाश नारायण अपने आंदोलनों की वजह से काफी प्रसिद्ध होने लगे तथा बाद में इन्हें ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन का अध्यक्ष बनाया गया जो कि भारत का सबसे बड़ा श्रमिक दल था इसके अध्यक्ष पद पर है स्पोर्ट्स तक कार्यरत रहे।

भारत की आजादी के 27 वर्ष बाद जब देशवासी भ्रष्टाचार भुखमरी और महंगाई से ग्रस्त थे और देश को एक बड़ी क्रांति की आवश्यकता थी उस समय जय प्रकाश नारायण ने सन 1974 में बिहार के छात्रों के साथ मिलकर छात्र आंदोलन की शुरुआत की जो एक विकराल रूप ले लिया और छात्रों के साथ साथ हम लोग इस आंदोलन से जुड़ने लगे जिसे बाद में बिहार आंदोलन कहा गया इस आंदोलन को जय प्रकाश नारायण ने शांतिपूर्ण संपूर्ण क्रांति नाम दिया।

जब देश में इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 आपातकाल की घोषणा की थी उस दौरान इलाहाबाद कोर्ट ने इंदिरा गांधी को एल्क्टोरल कानून को तोड़ने का दोषी पाया और इसी को मुद्दा बनाकर जयप्रकाश नारायण इंदिरा गांधी के साथ साथ अन्य कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी इस्तीफे की मांग करने लगे।

जयप्रकाश नारायण ने इसके बाद सरकार के विरोध में रामलीला मैदान में लाखों लोगों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ राष्ट्रवादी कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता सिंहासन खाली करो जनता आती है को दोहराया जिसके बाद इन्हें पुणे गिरफ्तार कर लिया गया और चंडीगढ़ के जेल में रखा गया।

इसी दौरान बिहार में भीषण बाढ़ आ गई और जयप्रकाश नारायण सरकार से 1 माह के लिए पैरोल की मांग करने लगे ताकि वे बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का जायजा ले सके लेकिन ऐसा नहीं हुआ और बीच में उनकी तबीयत खराब होने लगी।

तबीयत ज्यादा खराब होने के बाद 12 नवंबर को इन्हें जेल से रिहा कर दिया गया उसके बाद उन्हें डायग्नोसिस के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया और जहां पता चला कि उन्हें किडनी संबंधित बीमारी है जिसके बाद उन्हें हमेशा डायग्नोसिस का सहारा लेना पड़ा।

कुछ समय बाद नोबेल पुरस्कार प्राप्त नोएल बेकर ने फ्री जेपी कैंपस का नेतृत्व किया जिसका मुख्य उद्देश्य जयप्रकाश नारायण को जेल से मुक्त कराना था।

18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने देश से आपातकालीन हटा दी और चुनाव की घोषणा की गई उसी दौरान जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी का गठन किया गया और जनता पार्टी ने चुनाव में विजई हुई तथा देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार आई।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी ने अपार सफलता हासिल की बावजूद इसके जयप्रकाश नारायण राजनीतिक पद से दूर रहें और मोरारजी देसाई को भारत का प्रधान मंत्री मनोनीत किया।

जयप्रकाश नारायण उच्च नीच कि भेदभाव ना से परे उन्नति की बात करने वाले आदर्श व्यक्ति थे उनके व्यक्तित्व में एक अद्भुत तेज था।

8 अक्टूबर सन 1979 को बिहार के पटना में भारत मां के अमर सपूत हमेशा के लिए चिर निद्रा में सो गया।

देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सन 1998 में लोकनायक और प्रखर समाजवादी जय प्रकाश नारायण को मरणोपरांत भारत के सरोज सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

महान राष्ट्रवादी कवि रामधारी सिंह दिनकर ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के बारे में लिखा है।


है जय प्रकाश व नाम जिसे इतिहास आदर देता है।बढ़कर जिस के पद चिन्हों की उन पर अंकित कर देता है।।कहते हैं जो यह प्रकाश को नहीं मरण से जो डरता है।ज्वाला को बुझते देख कुंड में कूद स्वयं जो पड़ता है।।

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आजादी के पहले नायक जिन से डरकर अंग्रेजों ने उन्हें एक रात में ही फांसी दे दी थी Biography of Great Freedom Fighter Mangal Pandey

जब भी हम देश की आजादी के बारे में सोचते हैं हमारे दिल में कई नाम और आंखों के सामने कई चेहरे आ जाते हैं.
ऐसे नायक जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ लुटा दिया उन्हीं में से एक थे उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में जन्मे नगवा गांव के मंगल पांडे जिनका जन्म 30 जनवरी 1827 में हुआ था.
मंगल पांडे का पूरा नाम वीर व र मंगल पांडे था, मंगल पांडे का नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में अग्रणी योद्धाओं के रूप में लिया जाता है. मंगल पांडे के पिता श्री दिनकर पांडे फैजाबाद के निवासी थे जो किन्ही कारणों से अपना पैतृक गांव छोड़कर नगवा आए थे जहां पर उनकी मुलाकात एक युवती से हुई और दिनकर पांडे ने नगवा में ही शादी कर ली और वहीं बस गए.
मंगल पांडे द्वारा भड़काई के Kranti से अंग्रेजी शासन पूरी तरह से पस्त हो गई थी लेकिन अंग्रेजों ने इस क्रांति को दबा दिया मंगल पांडे को फांसी देकर. लेकिन मंगल पांडे की शहादत ने देश में जो क्रांति उत्पन्न किया उस क्रांति ने अंग्रेजों को सौ साल के भीतर ही भारत को छोड़ने पर मजबूर कर दिया.

मंगल पांडे ईस्ट इंडिया कंपनी में एक सिपाही थे. 1857 की क्रांति ने एक ऐसे विद्रोह को जन्मे मंगल पांडे ने दिया जो संपूर्ण भारत में आग की तरह फैल गई और क्रांति आगे बढ़ती गई.
मंगल पांडे एक महान गायक थे जिन्हें अंग्रेजी हुकूमत ने गद्दार और विद्रोही माना लेकिन वह भारतीयों के लिए एक महानायक ही हमेशा रहे. मंगल पांडे की क्रांति में ईस्ट इंडिया कंपनी की जड़ों को हिलाकर रख दिया.
विद्रोह ज्यादातर बड़ा जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की बंगाल इकाई में यह बात फैल गई कि जिन कारतूस को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलते हैं उसमें सूअर और गाय की चर्बी मिलाई जाती है. लोगों में यह बात स्पष्ट हो गई कि अंग्रेज भारत में हिंदू सभ्यता और हिंदुस्तानियों के धर्म को भ्रष्ट करने पर आमादा है क्योंकि गाय और सूअर हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए नापाक था.

अंग्रेजी शासन में भारतीय सैनिकों के साथ हमेशा से ही भेदभाव होता रहा और अंग्रेजी शासन से भारतीय सैनिक संतुष्ट नहीं थे इसी बीच कारतूसों में चर्बी की अफवाह ने आग में जी का कार्य किया और जब 1857 में नए कारतूस सेना को बांटा गया उसी समय मंगल पांडे ने उसने कारतूस को लेने से इंकार कर दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी सेना ने मंगल पांडे से उनके हथियार छीन लिए तथा वर्दी उतार लेने का हुक्म दिया इस बीच नया मोड़ आया कि मंगल पांडे ने उस आदेश को मानने से ही इनकार कर दिया.
29 मार्च 1857 को जब अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन मंगल पांडे से उनकी राशिफल सुनने के लिए आगे बढ़े हुए उसी समय मंगल पांडे ने उन पर हमला कर दिया.

29 मार्च को ही मंगल पांडे ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बैरकपुर छावनी में बजा दिया तथा अपने साथियों से आवाहन किया कि मुकेश संघर्ष में उनका साथ दें लेकिन किसी ने भी मंगल पांडे का साथ नहीं दिया फिर मंगल पांडे ने उस अंग्रेज अधिकारी मेजर ह्यूसन को मौत के घाट अपने ही राइफल से उतार दिया जो मंगल पांडे की वर्दी छीनने और राइफल छीनने के लिए आगे आया था.

मंगल पांडे पर कोर्ट मार्शल के तहत मुकदमा चलाकर 6 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई, अंग्रेजी सरकार के द्वारा उन्हें 18 अप्रैल को फांसी दी जानी थी लेकिन अंग्रेजी सरकार ने मंगल पांडे को 10 दिन पहले ही फांसी दे दी जो कि पहले से निर्धारित की गई थी और इस प्रकार 8 अप्रैल 1857 को एक महान भारतीय नायक पंचतत्व में विलीन हो गया.

मंगल पांडे की फांसी की खबर देश भर में फैल गई और जगह-जगह पर हिंसा भड़क गया लेकिन उनके देश इस हिंसा को दबाने में सफल हो गए.
1857 में मंगल पांडे ने जो क्रांति का बीज बोया था वह 90 साल बाद एक ब्रिज के रूप में तब्दील हो गया और 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा.

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जिनकी सत्याग्रह और अहिंसात्मक विरोध ने अंग्रेजों को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया Biography of Mahatma Gandhi

Biography of Mahatma Gandhi

महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 में गुजरात के पोरबंदर क्षेत्र में हुआ था उनके पिता एक बैरिस्टर थे जिनका नाम करमचंद गांधी था, गांधीजी के जीवन में उनकी माता का प्रभाव बहुत ज्यादा था.
13 वर्ष की उम्र में गांधीजी का विवाह कस्तूरबा से हो गया जो समय गांधीजी से 1 साल बड़ी थी.
गांधी जी ने 1887 में मैट्रिक की परीक्षा पास की और 1888 में उन्होंने भावनगर के श्यामलदास कॉलेज में दाखिला लिया यहां से डिग्री प्राप्त करने के बाद महात्मा गांधी लंदन चले गए और वहां से बैरिस्टर बनकर अपने देश वापस आए.
सन 1894 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका गए थे और वहां पर होने वाले अन्याय के खिलाफ अवज्ञा आंदोलन चलाया तथा इस आंदोलन के पूर्ण होने के बाद वह स्वदेश लौटे.


सन 1916 में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे और देश की आजादी के लिए उठापटक शुरू कर दी, सन 1920 में कांग्रेस एक के एक बड़े लीडर बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु हो गई उसके बाद महात्मा गांधी कांग्रेस के मार्गदर्शक बने.




Biography-of-Mahatma-Gandhi





 प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान गांधी जी ने अंग्रेजों का सहयोग दिया था लेकिन उन्होंने अंग्रेजों से यह शर्त रखी थी कि अगर भारतीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों का साथ देंगे तो इस युद्ध के बाद अंग्रेज भारत को आजाद कर देंगे लेकिन हुआ इसके विपरीत प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने देश को आज याद नहीं किया.
लेकिन देश को आजादी दिलाने के लिए गांधीजी ने ओन्ली को आंदोलन किया इसमें 1920 में असहयोग आंदोलन 1930 में अवज्ञा आंदोलन तथा 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन प्रमुख था.
महात्मा गांधी का पूरा जीवन एक आंदोलन की तरह ही रहा उनके चलाए गए आंदोलन नितिन ऐसे आंदोलन थे जो पूरे देश में चलाए गए और सफल भी हुए.


सन 1940 में देश के युवा बच्चे और बूढ़े सभी को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गुस्सा था और इसी का परिणाम था 1942 का अंग्रेजो के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन या आंदोलन सबसे प्रभावी आंदोलन था इस आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत की जड़े तक हिला हिला दी.
और अंग्रेजो को इस बात का एहसास हो गया कि अब भारत में राज्य करना काफी मुश्किल है.


आंदोलन के अलावा गांधीजी ने सामाजिक बदलाव भी लाए इसमें छुआछूत को दूर करना प्रमुख था, उस समय में भी महात्मा गांधी पिछड़ी जातियों के उत्थान के लिए प्रयास करते रहे.
30 जनवरी 1948 को सुबह-सुबह नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को गोली मारकर हत्या कर दी नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को क्यों गोली मारी थी तथा महात्मा गांधी के अंतिम समय मैं उनके मुंह से जो अंतिम शब्द निकले वह थे हे राम


आखिर क्यों हुई महात्मा गांधी की हत्या? 

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अगर मैं शादी करूंगा तो मौत मेरी दुल्हन होगी आजादी के महानायक शहीद भगत सिंह Biography of Shaheed Bhagat Singh

शहीद भगत सिंह का परिवार पहले से ही स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था. भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1970 पंजाब में हुआ. शहीद भगत सिंह का जब जन्म हुआ उस समय उनके पिता श्री किशन सिंह जेल में थे भगत सिंह के परिवार के हर एक सदस्य में देशभक्ति कूट-कूट कर भरी थी क्योंकि भगत सिंह के चाचा श्री अजीत सिंह देश के एक बहुत बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिन्होंने बाद में एक भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन बनाई. भगत सिंह का दाखिला दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल में उनके पिता किशन सिंह ने कराई उसी समय भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह को अंग्रेजों से बचने के लिए ईरान जाना पड़ा क्योंकि अजीत सिंह के खिलाफ 22 मुकदमे दर्ज थे.

1919 में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ उससे भगत सिंह बहुत ही दुखी हुए तत्पश्चात इन्होंने महात्मा गांधी द्वारा एक आंदोलन चलाया जा रहा था जिसका नाम था असहयोग आंदोलन में भगत सिंह ने महात्मा गांधी का खुलकर समर्थन किया और अंग्रेजो को ललकार करके ब्रिटिश किताबों को जला दी. लेकिन जब चोरी चोरा में हिंसात्मक गतिविधि हुई इसकी वजह से महात्मा गांधी ने अपने असहयोग आंदोलन को बंद कर दिया महात्मा गांधी के इस फैसले से कोई खुश नहीं था भगत सिंह भी उनमें से थे.
क्योंकि महात्मा गांधी का अहिंसावादी रवैया किसी को हजम नहीं हो रहा था इसीलिए भगत सिंह ने महात्मा गांधी का साथ छोड़ कर दूसरी पार्टी ज्वाइन करने की सोची उसी समय भगत सिंह की मुलाकात सुखदेव भगवतीचरण और कुछ लोगों से हुई उस समय भगत सिंह लाहौर के नेशनल कॉलेज से b.a. की पढ़ाई कर रहे थे लेकिन भगत सिंह में देश भक्ति उफान पर थी और फिर भगत सिंह ने अपनी पढ़ाई छोड़कर देश की आजादी में कूद गए.

उसी समय भगत सिंह पर परिवार का बड़ा दबाव था उनके घरवाले भगत सिंह की शादी करा देना चाहते थे लेकिन भगत सिंह ने शादी करने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि देश की आजादी से पहले मैं शादी नहीं करूंगा और अगर “आजादी से पहले मैं शादी करूंगा तो मेरी दुल्हन होगी मौत”.
इसके बाद भगत सिंह ने नौजवान भारत सभा ज्वाइन कर ली लेकिन जब भगत सिंह के घर वालों ने उन्हें विश्वास दिला दिया कि वह भगत सिंह की शादी के बारे में नहीं सोचेंगे तब वह अपने घर लाहौर लौट गए जहां पर उन्होंने कीर्ति किसान पार्टी के लोगों से मेलजोल बढ़ाया और कीर्ति मैगजीन के लिए कार्य करने लगे जिससे कि वह अपना संदेश देश के नौजवानों तक पहुंचाते थे. सन 1926 में भगत सिंह को नौजवान भारत सभा का सिकरेटरी बना दिया गया फिर 1928 में भगत सिंह ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ज्वाइन की जिस पार्टी को चंद्रशेखर आजाद ने बनाया था.
30 अक्टूबर 1928 को साइमन कमीशन भारत आया जिसका विरोध भगत सिंह ने पूरी पार्टी के साथ मिलकर किया इस विरोध में भगत सिंह के साथ लाला लाजपत राय भी थे इन्होंने नारा लगाया कि “साइमन वापस जाओ” ठीक इसी समय पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया और इस लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय बुरी तरह से घायल हो गए कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई.
लाला जी की मृत्यु ने भगत सिंह को अंदर से झकझोर कर रख दिया और भगत सिंह ने लाला लाजपत राय की मृत्यु की बदला लेने की ठानी.
भगत सिंह इस घटना के जिम्मेदार ऑफिसर स्टार्ट को मारने का प्लान बना रहे थे लेकिन उन्होंने गलती से असिस्टेंट पुलिस को मार दिया तथा वहां से भगत सिंह तुरंत लाहौर की तरफ भाग निकले, लेकिन ब्रिटिश सरकार भी उस समय हाथों में हाथ धरे नहीं बैठी थी उन्होंने भगत सिंह को ढूंढने के लिए चारों तरफ जाल बिछा दिया था लेकिन फिर भी वह भगत सिंह को ढूंढने में असमर्थ थे उस समय भगत सिंह ने अपनी दाढ़ी को कटवा दिया था जोकि सिक्खों के सामाजिक धार्मिकता के खिलाफ है.

भगत सिंह चाहते थे कि एक बड़ा धमाका हो जिससे बहरे अंग्रेजों को सुनाई देने लगे इसमें उनका साथ दिया चंद्रशेखर आजाद राजदेव और सुखदेव ने. दिसंबर 1929 में भगत सिंह अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर अंग्रेजी सरकार की असेंबली हाल में बम ब्लास्ट किया यह बम ब्लास्ट सिर्फ आवाज करने वाला था जिसे एक ऐसी जगह पर फेंका गया जो खाली पड़ा था इस ब्लास्ट के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और लोगों को पर्ची बांटते हुए अपनी गिरफ्तारी दे दी.

भगत सिंह राजगुरु सुखदेव तीनों के खिलाफ मुकदमा चला जिसके बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई इस दौरान भगत सिंह राजगुरु सुखदेव इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे भगत सिंह को जेल में बहुत ही ज्यादा प्रताड़ित किया गया.
उस समय भारतीयों के साथ जेल में भी बहुत ही बुरा व्यवहार किया जाता था ना अच्छा कपड़ा मिलता था मैं खाना मिलता था नाही पीने के लिए पानी दिया जाता था.
भगत सिंह ने जेल के अंदर एक आंदोलन शुरु कर दिया और कई दिनों तक अन्न जल का त्याग किया उस दौरान भी अंग्रेजी पुलिस उन्हें यातनाएं देने से बाज नहीं आती थी.

सन 1930 में जेल से ही भगत सिंह ने एक किताब लिखी जिसका नाम था “Why I Am Atheist”.
भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी की सजा मुकर्रर की गई थी लेकिन पूरे देश में भगत सिंह राजगुरु सुखदेव की रिहाई के लिए प्रदर्शन हो रहे थे इस प्रदर्शन ने ब्रिटिश सरकार को झकझोर दिया ब्रिटिश सरकार इस आंदोलन के आगे इस प्रदर्शन के आगे पूरी तरह मस्त हो गई डर गई और भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को 1 दिन पहले 23 मार्च 1931 को फांसी की सजा दे दी.

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देश की आजादी के लिए मुस्कुराते हुए जान लुटाने वालों में शामिल थे चंद्रशेखर आजाद Biography of Chandrashekhar Aazad

क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गांव में पंडित सीताराम तिवारी के घर 23 जुलाई 1906 को हुआ था. चंद्रशेखर आजाद पैदा तो पंडित चंद्रशेखर तिवारी बनकर हुए थे लेकिन शहीद चंद्रशेखर आजाद बनकर हुए.
अंग्रेजों के जुल्म से देश को आजाद कराने के लिए मुस्कुराते हुए अपना सब कुछ लुटाने वालों में शामिल थे पंडित चंद्रशेखर तिवारी. चंद्रशेखर आजाद का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल पड़ने पर गांव छोड़कर मध्यप्रदेश चले गए थे. चंद्रशेखर आजाद की प्रारंभिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में बीता. चंद्रशेखर आजाद के रंग रंग में अंग्रेजों के प्रति नफरत थी. चंद्रशेखर आजाद एक ऐसे शख्स थे जो ना तो जुल्म को शांत कर सकते थे ना ही किसी और के ऊपर जुल्म होता हुआ देख सकते थे. जब 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड में निर्दोषों की हत्या हुई इस घटना ने चंद्रशेखर आजाद को झकझोर कर रख दिया.  जब महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन को खत्म किया जा रहा था उस समय चंद्रशेखर आजाद ने भी अपनी गिरफ्तारी दी क्योंकि वह इस आंदोलन के खत्म किए जाने के खिलाफ थे.
गिरफ्तारी के बाद चंद्रशेखर आजाद को जेल हुई उसके बाद से उन्हें जज के सामने पेश किया गया.
जब जज ने चंद्रशेखर आजाद से उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम आजाद बताया. उसके बाद से जब जज ने उनसे पूछा कि उनके पिता का नाम क्या है तो उन्होंने अपने पिता का नाम स्वतंत्रता बताया और उनका पता जेल बताया इससे जज आजाद के ऊपर भड़क गया और चंद्रशेखर आजाद को 15 दिनों की सजा सुनाई. तभी से उन्हें चंद्रशेखर आजाद के नाम से जाना जाने लगा.
जब महात्मा गांधी ने सन 1922 में असहयोग आंदोलन को अचानक बंद कर दिया तब चंद्रशेखर आजाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गए और 1 अगस्त 1925 को काकोरी कांड को अंजाम दिया.

जब भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया उसी समय आजाद ने दिल्ली असेंबली में बम धमाका किया. लेकिन एक ऐसा वक्त आया जब चंद्रशेखर आजाद का राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से मोहभंग हो गया और उन्होंने अपने संगठन के सदस्यों के साथ गांव की अमीर घरों में डाका डाला जिससे कि संगठन के लिए धन एकत्रित किया जा सके, लेकिन इन सबके बावजूद चंद्रशेखर आजाद और उनके साथियों ने कभी किसी गरीब के घर या किसी महिला पर हाथ नहीं उठाया.
जब दिल्ली असेंबली बम कांड में भगत सिंह और उनके साथी राजगुरु सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई गई तो चंद्रशेखर आजाद काफी दुखी हुए उन्होंने इन तीनों लोगों की सजा को कम करने का काफी प्रयास किया.
27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आजाद पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिलने इलाहाबाद गए और उन से निवेदन किया कि वह गांधीजी पर यह दबाव डालने की लार्ड इरविन इन तीनों लोगों की फांसी को उम्रकैद में बदल दे.
लेकिन नेहरु जी ने आजाद की बात नहीं मानी और इन दोनों लोगों में काफी कहासुनी हुई इसके बाद से चंद्रशेखर आजाद अपनी साइकिल पर सवार होकर अल्फ्रेड पार्क चले गए.
इसी बीच CID का SSP नॉट बाबर पुलिस बल के साथ वहां आ गया और दोनों तरफ से फायरिंग शुरू हो गई. जब आजाद के पास आखरी गोली थी तो उन्होंने इसे अपने कनपट्टी पर मार दिया क्योंकि उन्होंने यह प्रण किया था कि कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं मारूंगा इस प्रकार अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद शहीद हो गए. अंग्रेजी पुलिस ने बिना किसी को इस घटना की सूचना दिया ही चंद्रशेखर आजाद का अंतिम संस्कार कर दिया.

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जीवनी Netaji Subhas Chandra Bose Biography

देश को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अथक प्रयास किए, नेता जी का जन्म उड़ीसा के एक बंगाली परिवार में हुआ था नेताजी को देश से बहुत प्यार था और उन्होंने अपनी सारी जिंदगी देश को सौंप दी.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नेताजी ने जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज की स्थापना की. उनके द्वारा दिया गया जय हिंद का नारा देश का राष्ट्रीय नारा बन गया जो आज भी राष्ट्रीय नारा है.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सात भाई और दो बहने थी वे अपने माता-पिता की 9 वीं संतान थे.
नेता जी का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में हुआ था उनके माता का नाम प्रभावती देवी तथा पिता का नाम जानकीनाथ बोस था.
प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद नेताजी उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता चले गए जहां पर उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज से फिलॉस्फी में b.a. किया.
लेकिन इस कॉलेज में अंग्रेज प्रोफेसरों द्वारा भारतीयों को बहुत तंग किया जाता था जिसका नेताजी काफी विरोध करते थे, और यहीं से नेताजी के मन में अंग्रेजों को भारत से बनाने की सोच आई और एक जंग शुरू हो गई.

नेताजी की रूचि सिविल सर्विस में थी लेकिन उस वक्त एक ऐसा दौर था जिसमें भारतीयों के लिए सिविल सर्विस करना काफी कठिन माना जाता था, इसलिए इनके पिता ने इन्हें सिविल सर्विस की तैयारी के लिए इंग्लैंड भेज दिया.
तथा इस परीक्षा में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने चौथा स्थान हासिल किया जिसमें उन्हें सबसे ज्यादा नंबर अंग्रेजी में मिले थे. सन 1921 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इंडियन सिविल सर्विस की नौकरी ठुकरा दी और भारत लौट आए तथा देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में कूद पड़े.
भारत लौटने के बाद नेता जी ने कांग्रेस पार्टी ज्वाइन की कुछ कारणों से 1922 में चितरंजन दास ने मोतीलाल नेहरू के साथ कांग्रेस को छोड़ अपनी अलग स्वराज पार्टी बनाई.
तथा जल्दी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कोलकाता के नौजवान छात्र-छात्राएं युवाओं और मजदूरों के बीच अपनी एक अलग पहचान बना ली.
चारों तरफ चर्चा होने लगा जिससे नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक यूथ लीडर बन गए और सुभाष चंद्र बोस के नाम से लोग उन्हें जानने लगे.

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस पूरी दुनिया से मदद लेना चाहते थे जिससे अंग्रेजो के ऊपर दबाव पड़े और अंग्रेज हिंदुस्तान को छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए चले जाएं इसका खामियाजा भी सुभाष चंद्र बोस को भुगतना पड़ा और अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें जेल में डाल दिया. 1941 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने भतीजे शिशिर की मदद से जेल से भाग निकले जहां से हुए बिहार के गम आ गए और वे पेशावर जा पहुंचे इसके बाद नेताजी सोवियत संघ होते हुए जर्मनी पहुंच गए और वहां जाकर उन्होंने जर्मनी के शासक हिटलर से मुलाकात की.

नेताजी को यह बात अच्छी तरह से मालूम था कि इंग्लैंड हिटलर और पूरी जर्मनी का दुश्मन है तथा उन्होंने अंग्रेजों से बदला लेने के लिए दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाने की कूटनीति उचित लगी.
1945 में नेताजी जर्मनी को छोड़कर जापान पहुंचे जहां पर आजाद हिंद फौज के सदस्य और नेताजी के साथी मोहन सिंह वहां उनसे मिले इन लोगों ने फिर आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन किया तथा नेताजी ने आजाद हिंद सरकार नाम की एक पार्टी भी बनाई.
सन 1944 में नेताजी की आजाद हिंद फौज ने यह नारा दिया तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा और इस नारे ने देश में एक अलग ही क्रांति पैदा कर दी.

इसके बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंग्लैंड गए जहां पर उन्होंने ब्रिटिश लेबर पार्टी के अध्यक्ष व राजनीतिक लोगों से मिले तथा भारत की आजादी और भारत के भविष्य के बारे में उन्होंने चर्चा की लेकिन अंग्रेज चाहते थे कि नेताजी भारत छोड़ दे और इसके लिए वह नेता जी को मना रहे थे.
सन 1945 में जापान जाते हैं समय नेताजी का अभिमान ताइवान में क्रैश हो गया लेकिन नेताजी की बॉडी नहीं मिली इसके बाद नेताजी को मृत्यु घोषित कर दिया गया.
भारत सरकार ने कई जांच समिति मिठाई लेकिन इस बात की पुष्टि कभी नहीं हुई  और इस तरह से भारत मां का यह शेर पंचतत्व में विलीन हो गया.

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बाल गंगाधर तिलक की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle of Bal Gangadhar Tilak

महात्मा गांधी के पहले आजादी की लड़ाई के सबसे बड़े लीडर माने जाते थे जिन्हें गांधी जी ने आधुनिक भारत का निर्माता लाला लाजपत राय जी ने भारत में जाने वाला शेर और नेहरू जी ने भारतीय क्रांति का जनक बताया था गांधीजी के विद्रोह के तरीकों में भी वही मुद्दे होते थे जो तिलक पहले उठाया करते थे वैसे स्वदेशी स्वराज्य और शिक्षा में सुधार इन्होंने जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ भी संघर्ष किया है उन्होंने कहा था कि यदि भगवान छुआछूत को मानता है तो मैं उसे भगवान नहीं कहूंगा अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण अंग्रेजों के लिए परेशानी बने तिलक जी को एक बार जेल भी जाना पड़ा और कई दिक्कतें झेलनी पड़ी.

गंगाधर तिलक जी का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था इनके पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक एक स्कूल टीचर और संस्कृत के विद्वान थे जब 10 साल के थे तब इनकी मां की मृत्यु हो गई और जब यह 16 साल के हुए उनके पिता की मृत्यु हो गई 1871 में इनकी शादी तभी भाई जी से हुई जिनका नाम बदलकर सत्यभामा रख दिया गया मैथमेटिक्स तिलक को बहुत पसंद था इन्होंने मैथमेटिक्स बैचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री ली और जिन्होंने LLB करने के लिए बीच में छोड़ दिया इसके बाद उन्होंने प्राइवेट स्कूलों के कारण स्कूल छोड़ दिया और जनानी पत्र का संपादन शुरू किया मराठी में केसरी और हिंदी में मराठा उनका मानना था कि देश की आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता की भूमिका होती है देश की शिक्षा व्यवस्था काफी चिंतित रहते थे उनका मानना था कि जो शिक्षा अंग्रेज हमें दे रहे हैं इससे अंग्रेजों को लंबे समय तक भारत पर राज करने में आसानी होगी हमारे देश को कोई फायदा नहीं होने वाला इसके लिए उन्होंने अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ मिलकर डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी का गठन किया जिसका लक्ष्य था शिक्षा के साथ-साथ राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना अपने अखबारों में अंग्रेजों के खिलाफ लिखते थे और आजादी के लिए लड़ने के लिए लोगों को प्रेरित करते थे जिसके कारण और 18 महीने की जेल हो गई.

इन्होंने अन्य नेताओं के साथ मिलकर स्वदेशी आंदोलन शुरु किया और अंग्रेजों का जमकर विरोध किया मगर पार्टी में कुछ लीडर्स के रवैया से यह खुश नहीं थे दोस्तों गौर करने वाली बात यह है कि कोई भी अपनी तरफ से गलत नहीं सोच रहा था एक तरफ गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेता थे जो यह मानते थे कि अंग्रेजो के खिलाफ कड़ा कदम उठाने के लिए तैयार नहीं है और ऐसा करने पर सब कुछ खत्म हो सकता है इसलिए हमें आगे बढ़ना चाहिए दूसरी तरफ से जो यह मानते थे कि आजादी सिर्फ लड़का और बलिदान देकर ही मिल सकती है दुश्मन के आगे झुके बंगाल के विभाजन के बाद दोनों गुटों में तनाव बढ़ गया और कांग्रेस की मीटिंग में चुनाव को लेकर बहस हो गई और नरम दल और गरम दल अलग हो गई.
 तिलक को एक बार फिर अंग्रेजों के खिलाफ नस्लभेद को बढ़ावा देने के जुर्म में 6 साल की सजा हो गई जेल में इन्होंने  किताब लिखी और उससे मिले पैसे आजादी की लड़ाई में खर्च किए गए.
जेल से बाहर आने के बाद गांधीजी को हिंसा का रास्ता छोड़ने के लिए भी मनाने की बहुत कोशिश की 1916 में इन्होंने होमरूल लीग की स्थापना की जिसका लक्ष्य स्वराज लोगों के समूह को इकट्ठा करने के लिए इन्होंने गणेश उत्सव की शुरुआत की धार्मिक कार्यक्रमों के बाद आजादी की लड़ाई के लिए प्रोत्साहन दिया जाता था.
उन्होंने बाल विवाह और शराब पर प्रतिबंध लगाने के लिए भी सरकार पर दबाव डाला उन्होंने एक बार कहा था कि महान उपलब्धियां कभी भी आसानी से नहीं मिलती और आसानी से मिलने वाली उपलब्धियां कभी महान नहीं होती 1 अगस्त 1920 को इनका निधन हो गया पूरे देश में लाखों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी जीते जी तो नहीं पर इनके प्रयासों को धीरे-धीरे सफलता मिलने लगी और आजादी के लिए आंदोलन और भी मजबूत होता गया 27 साल बाद आज मिल गया.
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बटुकेश्वर दत्त की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle of Great Freedom Fighter Batukeshwar Datta

जिसने अपने देश को आजादी दिलाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी लेकिन वही देश आजादी के बाद उस के बलिदान को पूरी तरह से भूल गया इस महान क्रांतिकारी को आजादी के बाद अपना पेट पालने के लिए सिगरेट बेचनी पड़ी.
अपनी जिंदगी के अस्पताल में मौत का इंतजार करते रहे , बटुकेश्वर दत्त जिन्हें अपनी जिंदगी के अंतिम दिन अंतिम दिनों तक यह मलाल रहा कि उन्हें भी भगत सिंह और सुखदेव के साथ फांसी दे दी जाती तो उन्हें ऐसे भारत का घिनौना चेहरा देखने को नहीं मिलता.
बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर, 1910 को बंगाली कायस्थ परिवार में ग्राम-औरी, ज़िला-नानी बेदवान बंगाल में हुआ था
दिल्ली की विधानसभा में जिसे आज संसद भवन कहते हैं भगत सिंह ने एक बम फेंका था जिस काम में बटुकेश्वर दत्त उनके साथ थे इसके बाद दोनों क्रांतिकारियों ने अपनी गिरफ्तारी दी जहां बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास के लिए काला पानी की सजा सुनाई गई और अंडमान निकोबार भेज दिया गया.
जो बटुकेश्वर दत्त को यह पता लगा कि मेरे साथ भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई है तो उन्होंने वहां से भगत सिंह को एक पत्र लिखा मैं अपने आपको बहुत अपमानित महसूस कर रहा हूं क्योंकि मुझे आजीवन कारावास की सजा हुई और आप तीनों लोगों को भारत माता की गोद में सोने का सौभाग्य मिला.
तुम्हारा प्रिय भाई भगत इसके बाद जेल में ही बटुकेश्वर दत्त ने 1935 और 1937 में दो ऐतिहासिक भूख हड़ताल कि वहां जेल में है ना टीवी की बीमारी हो गई और उन्नीस सौ से 10 महीने पटना लाया गया और फिर 1938 में रिहा कर दिया गया लेकिन क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने की वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा और जिसके बाद 1945 में यह रिहा हुए और 1947 में देश आजाद हुआ इस महान क्रांतिकारी को तब तक बना चुके थे.
जिस सम्मान के वह अधिकारी थे उन्हें वह नहीं मिला, नवंबर 1947 में वह शादी के बंधन में बंध गए और उनके सामने परिवार को चलाने की जिम्मेदारी आई तो उन्हें देश की किसी भी संस्था ने नौकरी नहीं दी तब बेबस होकर उन्हें एक सिगरेट कंपनी में काम करना पड़ा उन्होंने बिस्कुट का एक छोटा सा बिजनेस शुरू किया जिसमें नुकसान होने की वजह से उसे बंद करना पड़ा.
भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारियों में से एक क्रांतिकारी को अपनी रोजी रोटी के लिए इस कदर भटकना पड़ा एक और ऐसी घटना है जब पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे इसके लिए दत्त ने भी आवेदन किया था परमिट के लिए जब वह पटना के कमिश्नर से मिलने गए तब कमिश्नर ने उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लाने को कहा यह सुनकर बहुत दुखी हुए जब अखबारों में छपी राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को यह पता चला तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर दत्त से माफी मांग ली 1963 में बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया गया मगर वह राजनीति की दुनिया से परे थी और तब तक ही रहने लगे थे 1964 में वह गंभीर रूप से बीमार पड़े उन्हें पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया उनकी ऐसी हालत देखकर उनके एक मित्र चमनलाल ने एक लेख में लिखा की आदत जैसे क्रांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी गलती की है खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी जो फांसी से बाल-बाल बच गया वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एरिया रगड़ रहा है उसे कोई पूछने वाला नहीं है जब अखबार में लेख छपा सत्ता में बैठे लोगों को होश आया और सरकार उनकी मदद के लिए सामने आई लेकिन तब की हालत काफी बिगड़ चुकी थी 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया जहां पर उन्होंने पत्रकारों से कहा सपने में भी नहीं सोच सकता था कि जिस दिल्ली में मैं बम फेंक लूंगा उस दिल्ली में मैं अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाऊंगा.
दिल्ली में एम्स में भर्ती किया गया जहां जांच में पता चला कि इन्हें कैंसर है और इनकी जिंदगी के कुछ ही दिन बचे हैं उन दिनों को अक्सर भगत सिंह सुखदेव राजगुरु और अपने सारे क्रांतिकारी दोस्तों को याद करके रोते रहते थे भगत सिंह की मां विद्यावती जी को बटुकेश्वर दत्त के बारे में पता लगा तो वह तुझसे मिलने हॉस्पिटल आए और भगत के दोस्त बटुकेश्वर की हालत देखकर बहुत दुखी हुए.
और 20 जुलाई 1965 को रात 1:50 पर भारत का यह क्रांतिकारी दुनिया छोड़कर चला गया उनका अंतिम संस्कार के अनुसार हुसैनीवाला पंजाब में किया गया.

जब 1968 में भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के समाधि तीर्थ का उद्घाटन किया जा रहा था तब भगत सिंह की मां ने उनकी समाधि पर फूल चढ़ाने से पहले बटुकेश्वर दत्त की समाधि पर फूल चढ़ाए थे बटुकेश्वर की यही तो एक मात्र इच्छा थी कि उन्हें भगत सिंह से अलग ना किया जाए.

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महान व्यक्तित्व राम प्रसाद बिस्मिल की जीवनी और उनके संघर्ष Biography of Ramprasad Bismil

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है
महान क्रांतिकारी और हिंदी और उर्दू के मशहूर कवि श्री राम प्रसाद बिस्मिल जी के बारे में जो खासकर देशभक्ति की कविताएं लिखते थे बिस्मिल जी हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक में से एक थे इन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी को अपना लक्ष्य बना लिया था.
अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए इन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में काकोरी कांड का प्लान बनाया था जिसमें पकड़े जाने के बाद ही नहीं गोरखपुर जेल में फांसी दे दी गई.
श्री रामप्रसाद जी का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में 11 जून 1897 को हुआ था, उन्होंने अपने पिता से हिंदी की शिक्षा दी थी तथा एक माली से उर्दू की शिक्षा प्राप्त की.
श्री राम प्रसाद बिस्मिल आर्य समाज का हिस्सा बन गए थे तो उस समय सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ संघर्ष कर रही थी.
त्रिवेदी नाम का एक क्रांतिकारी संगठन बनाया जिसका लक्ष्य था अंग्रेजों से लोहा लेना.
28 जनवरी 1980 को बिस्मिल्लाह एक  पंपलेट बनाकर बांटना शुरू किया जिसका नाम था देशवासियों के नाम संदेश संगठन के लिए फंड इकट्ठा करने के लिए 1918 में लोगों ने अंग्रेजों को तीन बार लूटा.
इसके बाद रामप्रसाद बिस्मिल दिल्ली चले गए और वहां पर प्रतिबंधित किताबों को बेचने लगे थे यह किताबें प्रतिबंधित इसलिए थी क्योंकि इनमें अंग्रेजो के खिलाफ काफी कुछ लिखा था.
जब उन्हें लगा कि वह पकड़े जा सकते हैं तब उन्होंने बच्चों की किताबों को लेकर भाग गए, एक बार वह अपने साथियों के साथ मिलकर दिल्ली और आगरा के बीच में लूट का प्लान बना रहे थे उसी समय पुलिस आ गई और दोनों तरफ से फायरिंग शुरू हो गई, बिस्मिल जी नदी में कूद गए और पानी के अंदर तैरते हुए वहां से बाहर निकल गए. उनकी बात की साथी गिरफ्तार कर लिए गए पता पुलिस को लगा कि बिस्मिल फायरिंग में मारे गए.

कुछ दिनों बाद पुलिस को पता चल गया कि बिस्मिल जिंदा है. वहां से बिस्मिल दिल्ली चले गए इसके बाद 2 साल तक सरकार की आंखों से बचते हुए जगह-जगह लोगों को जागरुक करते रहे और देशभक्ति की कविताएं लिखते थे करने के लिए प्रोत्साहित करने लगे.
चौरी चौरा कांड में लोगों के गुस्से के लिए इनके भाषण को भी जिम्मेदार बताया गया इसी कांड के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया जिसके कारण बिस्मिल और अनेकों साथी कांग्रेस से नाराज हो गए थे.
उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक एक संगठन बनाया जिस संगठन में काकोरी कांड का ढांचा तैयार किया गया जिसका प्रतिनिधित्व रामप्रसाद बिस्मिल कर रहे थे.
लखनऊ के पास काकोरी में ट्रेन को रोक कर उसमें मौजूद सरकारी खजाना लूट लिया गया इसमें दोनों तरफ से फायरिंग हुई और इसमें एक भारतीय मारा गया.
इसी मामले में केस हुआ फिर 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी गई.
श्री राम प्रसाद बिस्मिल का अंतिम संस्कार राप्ती नदी के किनारे किया गया जिसे आज राजघाट के नाम से जाना जाता है .

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अमर शहीद खुदीराम बोस का जीवन परिचय और उनके संघर्ष Khudiram Bose Biography and Struggle

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं बात 30 अप्रैल उन्नीस सौ आठ की है मुजफ्फरपुर बिहार की रात्रि करीब 8:30 बजे थे और रात के अंधेरे में 18 साल का लड़का दुश्मन के आने का इंतजार कर रहा था जिसके एक हाथ में बम और दूसरे हाथ में पिस्तौल थी अगर तुम ने साथ नहीं दिया तो हाथ में पिस्तौल होनी चाहिए दुश्मन को उड़ाने के लिए.
दुश्मन अंग्रेज मजिस्ट्रेट था जिसने अपने कलकत्ता की पोस्टिंग के दौरान हिंदुस्तानियों पर बेशुमार जुल्म किए थे और यह 19 साल का लड़का था अमर शहीद खुदीराम बोस.

बस कुछ ही दिन पहले मुजफ्फरपुर आए थे हरेन पंड्या के नाम से मोती झील इलाके की एक धर्मशाला में ठहरे थे. दुश्मन के हर एक गतिविधि पर उनकी नजर थी.  कहां जाता है किधर जाता है जो जाता तो क्यों जाता है ?
 खुदीराम बोस की और जैसे ही दुश्मन की बग्गी आई और खुदीराम बोस की निगाह पर आई.
खुदीराम बोस का हाथ चल पड़ा बिना रूके बिना सोचे और अपने निशाने पर लगा और दुश्मन की बग्गी हवा में उड़ते हुए गिर पड़ी.
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा.

 खुदीराम बोस को बचपन से ही बमों से खेलने का शौक था कॉलेज में जब बाकी बच्चों के सवाल गणित या विज्ञान से जुड़े होते थे उस वक्त खुदीराम बोस अपने टीचर से पूछ रहे होते थे कि पिस्तौल कैसे बनती है.

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को हबीबपुर मिदनापुर जिला बंगाल में हुआ था, खुदीराम बोस एक युवा क्रांतिकारी थे जिनकी शहादत ने पूरे भारतवर्ष में क्रांति की एक लहर पैदा कर दी खुदीराम बोस देश की आजादी के लिए मात्र 19 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ गए.
उनके पिता का नाम तीन लोक के नाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मी पूजा देवी था.

जब बंगाल विभाजन के विरोध में लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे उस दौरान कोलकाता के मजिस्ट्रेट किंग्स फोर्ड ने भारतीयों को क्रूर दंड दिया था. इसी वजह से क्रांतिकारियों ने King जोड़ को को मारने का निश्चय किया और इस कार्य के लिए खुदीराम बोस ओर प्रफुल्ल कुमार का चयन किया. खुदीराम बोस मजिस्ट्रेट के घर के सामने बम लेकर उसका इंतजार कर रहे थे और उन्होंने मजिस्ट्रेट की बग्गी पर बम फेंक दिया लेकिन बग्गी में मजिस्ट्रेट नहीं बल्कि दो यूरोपियन महिलाएं थी.
इसी आरोप में खुदीराम बोस को गिरफ्तार किया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया फिर उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई 11 अगस्त 1968 को उन्हें फांसी दे दी गई उसमें उनकी उम्र करीब 19 साल की थी.
खुदीराम बोस इतने नृत्य की हाथ में गीता लेकर खुशी-खुशी फांसी पर चढ़ गए उनकी इन्हीं निडरता वीरता और शहादत ने उन्हें इतना लोकप्रिय कर दिया कि बंगाल के एक खास जुलाहे ख़ास जुलाहे वर्ग के हुए अनुकरणीय हो गए.

खुदीराम बोस की फांसी के बाद कई दिनों तक स्कूल कॉलेज बंद रहे विद्यार्थियों तथा देशवासियों ने कई दिनों तक सुकून आया