स्वतंत्रता सेनानी हेमू कलानी की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle Of Hemu Kalani

देश को अंग्रेजों के चुंगल से आजाद कराने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में भारत मां के लाखों सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को आजाद कराया, देश को अंग्रेजों से आजाद कराकर उन्हें देश से भगाने वाले वीरों में एक सबसे कम उम्र का बालक था जिसका नाम अमर शहीद हेमू कलानी था देश कभी उसके बलिदानों को भुला नहीं पाएगा।

हेमू कलानी का जन्म 23 मार्च 1924 को भारत के / सिंध प्रदेश में हुआ था उनके पिता का नाम वेश मूल कालानी और उनकी माता का नाम जेठी बाई था।

हेमू कलानी के दादा मंगाराम कालानी नरम दल के क्रांतिकारी संगठन के सदस्य थे, अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ कर फेंक ने के लिए हेमू गरम दल के सेनानियों में शामिल थे।

हेमू कलानी गुप्त सूचनाओं को किताब के जरिए अपने मित्र द्वारा पंजाब के गरम दल और सिंह तथा बलूचिस्तान  के क्रांतिकारियों को भेजने का कार्य करते थे।

हेमू कलानी छोटी सी उम्र में अपने साथियों के साथ अंग्रेजों की कालोनियों में दौड़ कर भारत माता की जय का नारा लगाते हुए हाथों में तिरंगा लेकर रात में अंग्रेजों के घरों में पत्थर फेंकते थे।

एक बार हेमू कलानी को यह सूचना मिली की अंग्रेजी हुकूमत का एक खूंखार दस्ता हथियारों से भरी रेल गाड़ी सक्खर स्टेशन से गुजर कर बलूचिस्तान जा रही है जहां पर क्रांतिकारियों को मारने की तैयारी है कोई बात बुरी लगी और उन्होंने हथियारों से भरी रेल गाड़ी को डूबा ने की योजना बनाई।

हेमू कलानी अपने चार साथियों के साथ सक्खर जिले के बड़े पुल में गिराने की योजना बनाई और रेल के पटरी की फिश प्लेट खोल दी।

रेलगाड़ी को सक्खर स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर थी तभी रेलवे केबिन के कर्मचारी ने खुली हुई इस प्लेट को देख लिया और तुरंत लाल झंडी दिखाकर रेलगाड़ी को रोक लिया।

उधर हेमू कलानी अपने साथियों के साथ पुल के नीचे एक किनारे पर बैठकर उत्साहित हो रहे थे इतने में अंग्रेजी हुकूमत के उस दस्ते ने हेमू कलानी को पकड़ लिया लेकिन हेमू कलानी अपने साथियों को भगाने में सफल रहे।

ब्रिटिश हुकूमत के अधिकारियों ने जेल में हेमू कालानी पर काफी जुल्म किया लेकिन उन्होंने अपने साथ ही योजना में शामिल अपने क्रांतिकारी मित्रों के नाम अंग्रेजी हुकूमत को नहीं बताएं।

हेमू कलानी को अंग्रेजी हुकूमत के अफसर ने बर्फ की सिल्ली पर लिटा कर कोड़े से मार कर उनके शरीर को छलनी छलनी कर दिया तथा उनके जख्मों में नमक भरकर कई बार उन पर कोड़े बरसाए लेकिन हेमू कलानी ने अपने साथियों के नाम नहीं बताए और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे।

रेल पटरी की फिश प्लेट खोलने के आरोप में हेमू को सक्खर न्यायालय ने उम्र कैद की सजा सुनाई

बाद में न्यायालय ने फैसले की नकल हैदराबाद सिंध को को भेज दिया जब हैदराबाद के मुख्य ब्रिटिश न्यायाधीश ने उस फैसले को पढ़ा तब हेमू कलानी को कोर्ट में लाया गया लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के न्यायाधीश कर्नल रिचर्डसन ने उस फैसले को बरकरार रखा।

हेमू कलानी न्यायाधीश कर्नल रिचर्ड्सन से 3 फीट की दूरी पर थे और फैसला सुनने के बाद इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे और ब्रिटिश न्यायाधीश कर्नल रिचर्ड्सन के मुंह पर थूक दिया।

यह खबर देश में आग की तरह फैल गई उसके बाद हैदराबाद सिंध कोर्ट ने हेमू कालानी की उम्र कैद की सजा को फांसी में तब्दील कर दिया।

फांसी से पहले हेमू कलानी की मां जेडी भाई उनसे मिलने के लिए जेल में आई और उन्होंने कहा कि मुझे अपने बेटे पर गर्व है जो भारत माता को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे रहा है यह कहते हुए शिवा बिल्कुल भी नहीं रोई जिसे देख कर सभी जेल में बंद कैदी हैरान रह गए।

हेमू कलानी ने जेल में अपनी मां से यह वचन लिया और कहा कि आप और पिताजी आजादी के आंदोलन को उस समय तक मत रोकना जब तक देश को आजादी ना मिल जाए।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पहली बार हेमू कलानी के लिए रोए और उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को फांसी की सजा माफ करने के लिए पत्र लिखा लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने महात्मा गांधी की अर्जी को नकार दिया तथा 21 जनवरी 1943 को भारत मां के सपूत को फांसी पर लटका दिया।

फांसी से पहले हेमू कलानी इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाकर हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए।

सन 1998 में भारत सरकार ने संसद भवन में हेमू कलानी की प्रतिमा को स्थापित किया इससे पहले 1982 में हेमू कलानी पर एक डाक टिकट जारी किया गया जिसका विमोचन तत्कालीन प्रधानमंत्री ने किया था।

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