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विनायक दामोदर सावरकर की जीवनी और उनके संघर्ष Biography Of Vinayak Damodar Sawarakar

विनायक दामोदर सावरकर भारत के इतिहास के एक महान क्रांतिकारी इनका जन्म महाराष्ट्र प्रांत में नासिक के निकट ठाकुर गांव में हुआ था उनके छोटी उम्र में ही उनकी माता पिता का देहांत हो गया इसके बाद उनकी बड़े भाई गणेश ने परिवार के पालन पोषण का कार्य संभाला और कठिनाई की इस घड़ी में गणेश के व्यक्तित्व का उनके ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा बचपन से ही कुछ कविताएं भी लिखी थी.
वी डी सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को बाबुल गांव में हुआ था यह बागोर गांव वर्तमान महाराष्ट्र में स्थित है इनके पिता का नाम दामोदर सावरकर माता का नाम राधाबाई तथा पत्नी यमुनाबाई था.

 दामोदर सावरकर जी के विषय में सावरकर जी को भारतीय राष्ट्रवाद और देशभक्ति का पर्यायवाची कहा जाता है वीर सावरकर शब्द का स्मरण करते हैं अनुपम त्याग अदम्य साहस महान वीरता और उत्कर्ष देशभक्ति से ओतप्रोत इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हमारे सामने साकार होकर खुद पढ़ते हैं  सावरकर जी का व्यक्तित्व साधारण असाधारण था बचपन से लेकर मृत्यु पर्यंत उनके जीवन का एक-एक क्षण राष्ट्रभक्ति राष्ट्र सेवा समाज सेवा और हिंदू राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए संघर्ष में व्यतीत हुआ वह हिंदू राष्ट्र हिंदुस्तान को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्ति दिलाने के लिए इस पोर्टल पर अवतरित हुए और अंत में स्वाधीन किंतु खंडित हिंदुस्तान को अखंड हिंदू राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित कराने का महान सपने देखते देखते ही फिदा हो गए हो सकता है आतंकवादी विचारों के प्रति असंतोष के कारण उन्हें सांप्रदायिक घोषित करने का प्रयास किया जाए फिर भी नहीं जा सकता उन्होंने अपने देश से प्यार किया अपनी मातृभूमि के लिए जीने की तमन्ना थी और किसी भी कीमत पर देश का विभाजन नहीं होने देना चाहते थे.
वीर सावरकर ने हिंदू राष्ट्रवाद की अवधारणा का प्रतिपादन किया हिंदू राष्ट्रवाद की भावना कोई नवीन विचार नहीं है सावरकर से पहले स्वामी विवेकानंद लोकमान्य तिलक लाला लाजपत राय हिंदू राष्ट्रवाद के विचार को प्रतिपादित कर चुके थे हिंदू राष्ट्रवाद को एक निश्चित रूप में संकलित किया.

विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वयं लोकमान्य तिलक ने की परिणाम स्वरुप फर्गुसन कॉलेज के अधिकारियों ने सावरकर को कॉलेज से निष्कासित कर दिया.

स्कूल से निकाले जाने के बावजूद उन्हें बैचलर आफ आर्ट की डिग्री लेने की इजाजत थी।
विनायक दामोदर सावरकर के डिग्री की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक राष्ट्रीय कार्यकर्ता श्यामजी कृष्णा वर्मा ने उन्हें कानून की पढ़ाई पूरी करने के लिए इंग्लैंड भेजने में उनकी सहायता की और उन्हें शिष्यवृत्ती भी दिलवाई।
उस दौरान बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में गरम दल की स्थापना की गई थी।

जब विनायक दामोदर सावरकर को महात्मा गांधी की हत्या में दोषी पाया गया तो मुंबई स्थित उनके घर पर लोगों ने गुस्से से पत्थर फेंकना शुरू कर दिया लेकिन कुछ समय बाद कोर्ट की कार्रवाई में उन्हें निर्दोष पाया गया और उन्हें रिहा कर दिया गया ।
विनायक दामोदर सावरकर पर हमेशा यह इल्जाम मिलता था कि वे भड़काऊ हिंदू भाषण देते हैं लेकिन इस आरोप पर भी उन्हें उन्हें निर्दोष पाकर रिहा कर दिया गया वे अंतिम सांस तक हिंदू धर्म का प्रचार करते रहे और हिंदुत्व के जरिए लोगों को जागृत करते रहे।

विनायक दामोदर सावरकर के भाषणों पर बैन लग गया था लेकिन उसके बावजूद वे राजनीतिक गतिविधियां नहीं छोड़ रहे थे अपनी आखरी सांस तक व सामाजिक कार्य करते रहे।

आजादी के बाद पुणे विश्वविद्यालय ने उन्हें डी लिट की उपाधि दी, तिरंगे में जो बीच में चक्कर लगा हुआ है इसका सुझाव सर्वप्रथम विनायक दामोदर सावरकर ने ही दिया था।

26 फरवरी 1966 को विनायक दामोदर सावरकर ने मुंबई में अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया और पंचतत्व में विलीन हो गए।

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स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की जीवनी Biography Of Pandit Jawahar Lal Neharu

पंडित जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे जिन्हें आजादी के लिए लड़ने और संघर्ष करने वाले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम किए महापुरुषों के रूप में जाना जाता है. पंडित नेहरू हमेशा से ही अपने भाषणों से लोगों के दिलों को जीत लेते थे यही कारण था कि वह आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने.
पंडित जवाहरलाल नेहरु का पूरा नाम जवाहरलाल मोतीलाल नेहरू था जो उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद जिले में 14 नवंबर 1889 को मोतीलाल नेहरु के घर पैदा हुए. प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद पंडित नेहरू 1910 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय से ट्रिनिटी कॉलेज से उपाधि संपादक के शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1912 में लंदन से बैरिस्टर की उपाधि ली.

पंडित नेहरु हमेशा से महात्मा गांधी के सहायक रहे और भारत को स्वतंत्र कराने में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया.
पंडित नेहरू को आधुनिक भारत का रचयिता माना जाता था जिन्हें बाद में चाचा नेहरू के नाम से लोग जानने लगे.

लंदन से लौटने के बाद पंडित नेहरू सबसे कम उम्र में भारतीय राजनीति में सक्रिय हो गए सन 1920 में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और पार्टी ने उन्हें एक विश्वसनीय सलाहकार माना.
 तत्पश्चात पंडित जवाहरलाल नेहरु ने अंग्रेजी हुकूमत से छुटकारा पाने की घोषणा की और भारत को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की मांग की.
 सन 1930 की बात है पंडित नेहरू और कांग्रेस पार्टी ने भारतीय स्वतंत्रता अभियान का एक मोर्चा संभाला ताकि देश को अंग्रेजो के चुंगल से मुक्त कराया जा सके.

कांग्रेस से अलग होकर मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग की स्थापना की जो पूरी तरह से विफल रही तथा मुस्लिमों की हालात को देखते हुए मोहम्मद अली जिन्ना ने पुणे मुस्लिम लीग का वर्चस्व स्थापित किया लेकिन नेहरू और जिन्ना जानते थे कैसे एक दूसरे की ताकत को बांटा जा सकता है.

सन 1928 और 1929 में पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के वार्षिक सत्र का आयोजन किया गया था लेकिन इस आयोजन से पहले ही कांग्रेसमें दो घुट बन गए थे एक गुट में नेताजी सुभाष चंद्र बोस जो पूर्णता की मांग कर रहे थे और दूसरे गुट में स्वयं नेहरू जी थे।

दिसंबर 1929 में नेहरू जी के नेतृत्व में लाहौर में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन का आयोजन किया गया और इस आयोजन में सभी ने एकमत होकर पूर्ण स्वराज की मांग का प्रस्ताव पारित किया।

26 जनवरी 1930 को लाहौर में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का ध्वज लहराया।

जब ब्रिटिश हुकूमत ने सन 1935 में भारत अधिनियम का प्रस्ताव पारित किया था उसी समय कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का फैसला किया और कांग्रेस ने हर प्रदेश में सरकार बनाई और सबसे अधिक जगह पर जीत हासिल की जिसके बाद नेहरू जी को कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया।

सन 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया गया था उसी समय अंग्रेजी हुकूमत ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को गिरफ्तार कर लिया है इसके बाद उन्हें 1945 में जेल से रिहा किया।

व्हिस्की विभाजन के बाद जब कांग्रेसमें प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए चुनाव किया गया उसमें सरदार वल्लभभाई पटेल एवं कृपलानी जी को सबसे अधिक वोट मिले लेकिन महात्मा गांधी जी के अनुरोध पर पंडित जवाहरलाल नेहरू को भारत का प्रथम प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया गया।

अपनी अच्छी छवि कार्य एवं वक्तव्य के दम पर पंडित जवाहरलाल नेहरू तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने उन्होंने देश को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए अनेकों प्राप्त किए तथा आधुनिक भारत के सपने की एक मजबूत नींव रखी।

इतनी मेहनत के बाद भी पंडित जवाहरलाल नेहरू चीन और पाकिस्तान से मित्रता पूर्ण संबंध नहीं स्थापित कर पाए वे हमेशा पाकिस्तान और चीन के साथ रिश्ते सुधारने के लिए प्रयास करते रहे लेकिन जब सन 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया नेहरू जी को अधिक पीड़ा हुई।

27 मई 1964 दिल का दौरा पड़ने के कारण भारत मां का यह लाल हमेशा के लिए पंचतत्व में विलीन हो गया उनकी मौत देश के लिए एक बड़ी क्षति थी इतिहास हमेशा उन्हें याद रखेगा।

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सी राजगोपालाचारी की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle of C. Rajagopalachari

सी राजगोपालाचारी का जन्म 10 दिसंबर 1878 को मद्रास  के थोरापल्ली नामक गांव में हुआ था राजगोपालाचारी का घर का नाम राजाजी था उनका जन्म एक धार्मिक परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम चक्रवर्ती वेंकट आर्यन और माता का नाम सिंगारम्मा था।

सी राजगोपालाचारी बचपन से ही शारीरिक रूप से बेहद कमजोर थे और उनके माता-पिता को ऐसा महसूस होता था कि शायद सी राजगोपालाचारी ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रह पाएंगे।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा थोरापल्ली में हुई उसके बाद वे होसुर आर्मी गवर्नमेंट बॉयज हायर सेकेंडरी स्कूल में दाखिला लिया और 1891 में मैट्रिकुलेशन की परीक्षा कि इसके बाद सन 18 94 में बेंगलुरु के सेंटर कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की तथा उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में कानून की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया और सन 1897 में पढ़ाई को पूरी किया।

वकालत की शिक्षा पूरी करने के बाद राजगोपालाचारी ने वकालत प्रारंभ की , इसी बीच सी राजगोपालाचारी की मुलाकात उस दौर के प्रसिद्ध राष्ट्रवादी देशभक्त बाल गंगाधर तिलक से हुई और सी राजगोपालाचारी बाल गंगाधर तिलक से प्रभावित होकर राजनीति में प्रवेश कर गए और नगरपालिका के सदस्य उसके बाद फिर नगर पालिका के अध्यक्ष नियुक्त किए गए।

सी राजगोपालाचारी धीरे धीरे आंदोलनों में हिस्सा लेने लगे और 1906 और 1907 के कांग्रेस के अधिवेशन में हिस्सा लिया।

सन 1917 की बात है जब राष्ट्रवादी एवं स्वाधीनता कार्यकर्ता पी वरदाराजुलू पर विद्रोह का मुकदमा चला था तब राजगोपालाचारी ने न्यायालय में स्वाधीनता कार्यकर्ता पी वरदा राजूलु नायडू के पक्ष में तगड़ी दलील दी थी ।

राजगोपालाचारी कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से थे तथा वे गांधी जी के काफी करीबी थे जब गांधी जी ने दांडी मार्च निकाला था तब उन्होंने भी नमक कानून को तोड़ा था ।

राजगोपालाचारी जी शुरू से ही भारत की जात-पात के खिलाफ थे उस दौर में जब जातिवाद अपने चरम पर था दलितों को मंदिरों में प्रवेश पर रोक थी तब राजगोपालाचारी जी ने इसका जमकर विरोध किया जिसके फलस्वरूप दलितों को मंदिरों में प्रवेश मिलने लगी।

किसानों को कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए सन 1938 में राजगोपालाचारी जी ने एग्रीकल्चर डेट रिलीफ एक्ट कानून बनाया जिससे किसानों को कर्ज से राहत मिली।

अंतिम गवर्नर माउंटबेटन के बाद राजगोपाल चारी भारत के पहले गवर्नर बने, इन्हें कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी के रूप में भी नियुक्त किया गया था।

सन 1950 में जब जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में सरकार बनी तो सी राजगोपालाचारी को गृह मंत्री बनाया गया।

सन 1952 में राजगोपालाचारी मद्रास के मुख्यमंत्री नियुक्त हुए बाद में नेहरू जी से वैचारिक मतभेद के कारण यह कांग्रेस से अलग हो गए और एंटी कांग्रेस स्वतंत्र पार्टी का गठन किया।

राजगोपालाचारी एक बेहतरीन लेखक थे उन्हें तमिल और अंग्रेजी बहुत अच्छे से आती थी, इन्होंने संस्कृत ग्रंथ रामायण का तमिल में अनुवाद किया और अपने कारावास के समय के बारे में उन्होंने एक किताब लिखी जिसका नाम था मेडिटेशन इन जेल

इनकी पार्टी 1962 के लोकसभा चुनाव में 18 और 1967 के लोकसभा चुनाव में 45 सीट हासिल की तथा तमिलनाडु और कई राज्यों में प्रभावशाली रही।

उनके पुत्र चक्रवर्ती राजगोपालाचारी नरसिम्हन कृष्णागिरी 1952 से 1962 तक लोकसभा सदस्य रहे तथा बाद में उन्होंने अपने पिता की आत्मकथा भी लिखी।

सन 1972 में सी राजगोपालाचारी का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और उन्हें मद्रास गवर्नमेंट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया जहां इलाज के दौरान 25 दिसंबर 1972 को वह सदा के लिए इस संसार को छोड़कर चले गए।

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महान समाज सुधारक पंडित मदन मोहन मालवीय की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle Of Madan Mohan Malviya

महान समाज सुधारक और भारत माता की सेवा में अपना जीवन समर्पित करने वाले भारत रत्न महा मना पंडित मदन मोहन बालवीर का जन्म 25 दिसंबर 1861 को इलाहाबाद के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम पंडित बैजनाथ और माता का नाम मीना देवी था।

पंडित मदन मोहन मालवीय जी की शिक्षा दीक्षा हरा देव जी के मार्गदर्शन में हुई जहां से उनकी सोच पर हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृत का गहरा प्रभाव पड़ा।

उन्होंने इलाहाबाद के सेंट्रल कॉलेज से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की और कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री ली और इलाहाबाद में ₹40 मासिक वेतन पर शिक्षक के पद पर नियुक्त किए गए

पंडित मदन मोहन मालवीय की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी वह आगे m.a. की पढ़ाई करना चाहते थे लेकिन आर्थिक हालातों की वजह से नहीं कर पाए।

सन 1886 की बात है जब दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में भाग लेने मदन मोहन मालवीय भी गए थे तथा वहां दिए उनके भाषणों ने लोगों के दिलों को जीत लिया तथा लोगों ने काफी सराहना की।

मालवीय जी के वक्तव्य से वहां महाराज श्री रामपाल सिंह पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनके वक्तव्य और वाणी से प्रभावित होकर महाराज जी ने साप्ताहिक समाचार पत्र हिंदुस्तान का संपादक बनने तथा उसका प्रबंधन संभालने की जिम्मेदारी की पेशकश पंडित मदन मोहन मालवीय के सामने की।
जिसके बाद करीब ढाई वर्ष तक मदन मोहन मालवीय ने संपादक के पद की जिम्मेदारी संभाली तत्पश्चात उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई शुरू कर दी और पढ़ाई पूरी करने के बाद इलाहाबाद जिला न्यायालय में वकालत की प्रैक्टिस करने लगे।

पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने सन 1960 में अभ्युदय नाम से एक हिंदी की सप्ताहिक पत्रिका की शुरुआत की तथा सन 1915 में इस साप्ताहिक समाचार पत्र को दैनिक समाचार पत्र में बदल दिया।

जब कांग्रेसका 21 वां अधिवेशन बनारस में हो रहा था तब मदन मोहन मालवीय जी ने हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का विचार सबके सामने रखा और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का विधेयक पास हो गया 4 फरवरी 1916 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की गई तथा विश्वविद्यालय आज भी विश्व के उच्चतम विश्वविद्यालय में सम्मिलित है।

सामाजिक कार्यों के लिए मदन मोहन मालवीय जी ने अपनी वकालत सन 1911 में ही छोड़ दी थी लेकिन चौरी चौरा कांड में जब 177 लोगों को दोषी बताया गया था तब उन्हें बचाने के लिए मालवीय जी ने न्यायालय में केस लड़ा ऑरकुट ने 177 में से 156 अभियुक्तों को बाइज्जत बरी कर दिया।

पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने 1920 में असहयोग आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और लाला लाजपत राय जवाहरलाल नेहरू तथा महात्मा गांधी और अन्य कई नेताओं के साथ मिलकर साइमन कमीशन का विरोध किया।

मदन मोहन मालवीय जी ने स्वदेशी पर भी काफी जोर दिया उन्होंने नारा दिया था भारतीय खरीदो स्वदेशी खरीदो।

पंडित मदन मोहन मालवीय लखनऊ पैक्ट के साथ मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल के पक्ष में नहीं थे और सन 1920 में खिलाफत आंदोलन में कांग्रेस की भागीदारी के भी पक्ष में नहीं थे।

सन 1931 में मालवीय जी ने गोलमेज सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

पंडित मदन मोहन मालवीय को बीएचयू के कुलपति के पद पर नियुक्त किया गया था लेकिन उन्होंने एस राधाकृष्णन के लिए इस पद का त्याग कर दिया।

इसी दौरान समाचार पत्र हिंदुस्तान टाइम्स अपने बुरे दौर से गुजर रहा था और लगभग बंद होने के कगार पर था तभी पंडित मदन मोहन मालवीय इसके रक्षक बंद कर सामने आए और राष्ट्रीय नेताओं तथा उद्योगपति डी बिरला के आर्थिक सहयोग से उन्होंने इस समाचार पत्र को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया और सन 1946 तक वॉइस के अध्यक्ष बने रहे।

जब देश लगभग आजाद होने वाला ही था तब पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने महात्मा गांधी को क्या राय दी थी कि देश के विभाजन की कीमत पर स्वतंत्रा को शिकार ना करें।

12 नवंबर सन 1946 को इस महान देशभक्त भारत निर्माता और महान समाज सुधारक का निधन हो गया और वे पंचतत्व में विलीन हो गए।

पंडित मदन मोहन मालवीय जी के बारे में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि मदन मोहन मालवीय यह कैसी महान आत्मा है जिन्होंने आधुनिक भारत की नीव रखी।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पंडित मदन मोहन मालवीय को अपना बड़ा भाई और भारत निर्माता कहा करते थे पंडित मदन मोहन मालवीय एक ऐसे देश भक्त थे जिन्होंने भारत की आजादी के लिए हर संभव प्रयास किया और वह आज भी भारतीय युवाओं के प्रेरणा स्रोत है।

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महान स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल गफ्फार खान की जीवनी और उनके संघर्ष Biography of Abdul Gaffar Khan

अब्दुल गफ्फार खान के अनेकों नाम है उन्हें फखर ए अफगान, पाशा खान, बच्चा खान और बादशाह खान जैसे नामों से जाना जाता है।
अब्दुल गफ्फार खान का जन्म 6 फरवरी 1890 को उत्तमन जाई, हस्त नगर जो वर्तमान समय में पाकिस्तान में है में हुआ था।
उनके पिता का नाम बैरम खान था जो एक जमीदार थे, अब्दुल गफ्फार खान की प्रारंभिक शिक्षा एडवर्ड मिशन स्कूल में हुई जो ब्रिटिश द्वारा चलाई जाती थी।

अब्दुल गफ्फार खान पढ़ाई में बहुत आगे थे, अब्दुल गफ्फार खान को सीमांत गांधी के नाम से भी जाना जाता है ब्रिटिश हुकूमत से देश को स्वतंत्र कराने के लिए अब्दुल गफ्फार खान स्वतंत्र पख्तूनइस्तान आंदोलन के प्रेरणा स्रोत थे।

अब्दुल गफ्फार खान महात्मा गांधी के परम मित्र थे और उन्हें भी महात्मा गांधी की तरह हिंसात्मक आंदोलन के लिए जाना जाता था।

गफार खान को फ्रंटियर गांधी के नाम से भी संबोधित किया जाता था

ब्रिटिश हुकूमत को परेशान करने के लिए अब्दुल गफ्फार खान ने खुदाई खिदमतगार नाम से सामाजिक संगठन का प्रारंभ किया इसने अंग्रेजी हुकूमत को काफी परेशान किया।

संत 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान 23 अप्रैल को अब्दुल गफ्फार खान की गिरफ्तारी की गई जिसके बाद उनके संगठन खुदाई खिदमतगार ओं ने पेशावर में एक जुलूस भी निकाला लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने इस जुलूस पर गोलियां बरसाने का रूप दे दिया और कुछ ही समय में 200 से ढाई सौ लोग ब्रिटिश हुकूमत द्वारा मारे गए लेकिन यह जुलूस प्रति हिंसात्मक नहीं हुई यह अब्दुल गफ्फार खान के करिश्माई नेतृत्व का ही कमाल था।

अब्दुल गफ्फार खान कैसे भारत की स्थापना चाहते थे जो आजाद और धर्म निरपेक्ष रहे और अपने इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने खुदाई खिदमतगार संगठन बनाया जो महात्मा गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह जैसे सिद्धांतों से प्रेरित थी।

संगठन के कार्य और अब्दुल गफ्फार खान के करिश्माई नेतृत्व की वजह से देखते ही देखते संगठन में 100000 सदस्य शामिल हो गए और शांतिपूर्ण तरीके से लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत के साथ-साथ ब्रिटिश पुलिस और सेना का विरोध करना प्रारंभ कर दिया।

अब्दुल गफ्फार खान और महात्मा गांधी में एक अलग ही स्तर की मित्रता थी दोनों एक दूसरे का सम्मान करते थे और दोनों के दिल में एक दूसरे के लिए अपार स्नेह भरा हुआ था तथा दोनों ने एक साथ मिलकर कार्य किया

अब्दुल गफ्फार खान को कांग्रेश का सदस्य बनाया गया लेकिन जब भी महात्मा गांधी और कांग्रेस के विचारों में तालमेल नहीं होता था तब अब्दुल गफ्फार खान महात्मा गांधी के पक्ष में दिखाई देते थे।
कई सालों तक कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य रहने के बावजूद अब्दुल गफ्फार खान ने कांग्रेस का अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया।

अब्दुल गफ्फार खान हमेशा भारत के विभाजन का विरोध करते थे इसी वजह से कुछ कट्टरपंथी उन्हें मुस्लिम विरोधी कहते थे, विभाजन का विरोध करने की वजह से सन 1946 में पेशावर में उन पर जानलेवा हमला हुआ।

अब्दुल गफ्फार खान देश के विभाजन से खुश नहीं थे लेकिन बंटवारे के बाद उन्होंने पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय लिया तथा उन्होंने अपने देश के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट की लेकिन पाकिस्तान की सरकार और पाकिस्तानियों को हमेशा अब्दुल गफ्फार खान की निष्ठा पर और उनकी देशभक्ति पर संदेह रहा।
पाकिस्तान की सरकार हमेशा से अब्दुल गफ्फार खान को पाकिस्तान के विकास और प्रगति में बाधा मानती थी।

अब्दुल गफ्फार खान की देशभक्ति पर सब की वजह से पाकिस्तानी हुकूमत ने उन्हें नजर बंद कर दिया लेकिन कुछ समय बाद वे इंग्लैंड गए अपने इलाज के लिए तथा वहां से पाकिस्तान के बजाय अफगानिस्तान चले गए।

अब्दुल गफ्फार खान लगभग 8 वर्ष तक निर्वाचित जीवन बिताया सन 1972 में वह वापस पाकिस्तान लौटे तो बेनजीर भुट्टो की सरकार ने उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया।

सन 1987 में भारत सरकार ने अब्दुल गफ्फार खान को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया।

20 जनवरी 1988 में 97 वर्ष की आयु में पेशावर में उनकी मृत्यु हो गई उसके बाद उनकी इच्छा के अनुसार अफगानिस्तान के जलालाबाद स्थित उनके घर में उन्हें दफनाया गया।

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स्वतंत्रता सेनानी हेमू कलानी की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle Of Hemu Kalani

देश को अंग्रेजों के चुंगल से आजाद कराने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में भारत मां के लाखों सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को आजाद कराया, देश को अंग्रेजों से आजाद कराकर उन्हें देश से भगाने वाले वीरों में एक सबसे कम उम्र का बालक था जिसका नाम अमर शहीद हेमू कलानी था देश कभी उसके बलिदानों को भुला नहीं पाएगा।

हेमू कलानी का जन्म 23 मार्च 1924 को भारत के / सिंध प्रदेश में हुआ था उनके पिता का नाम वेश मूल कालानी और उनकी माता का नाम जेठी बाई था।

हेमू कलानी के दादा मंगाराम कालानी नरम दल के क्रांतिकारी संगठन के सदस्य थे, अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ कर फेंक ने के लिए हेमू गरम दल के सेनानियों में शामिल थे।

हेमू कलानी गुप्त सूचनाओं को किताब के जरिए अपने मित्र द्वारा पंजाब के गरम दल और सिंह तथा बलूचिस्तान  के क्रांतिकारियों को भेजने का कार्य करते थे।

हेमू कलानी छोटी सी उम्र में अपने साथियों के साथ अंग्रेजों की कालोनियों में दौड़ कर भारत माता की जय का नारा लगाते हुए हाथों में तिरंगा लेकर रात में अंग्रेजों के घरों में पत्थर फेंकते थे।

एक बार हेमू कलानी को यह सूचना मिली की अंग्रेजी हुकूमत का एक खूंखार दस्ता हथियारों से भरी रेल गाड़ी सक्खर स्टेशन से गुजर कर बलूचिस्तान जा रही है जहां पर क्रांतिकारियों को मारने की तैयारी है कोई बात बुरी लगी और उन्होंने हथियारों से भरी रेल गाड़ी को डूबा ने की योजना बनाई।

हेमू कलानी अपने चार साथियों के साथ सक्खर जिले के बड़े पुल में गिराने की योजना बनाई और रेल के पटरी की फिश प्लेट खोल दी।

रेलगाड़ी को सक्खर स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर थी तभी रेलवे केबिन के कर्मचारी ने खुली हुई इस प्लेट को देख लिया और तुरंत लाल झंडी दिखाकर रेलगाड़ी को रोक लिया।

उधर हेमू कलानी अपने साथियों के साथ पुल के नीचे एक किनारे पर बैठकर उत्साहित हो रहे थे इतने में अंग्रेजी हुकूमत के उस दस्ते ने हेमू कलानी को पकड़ लिया लेकिन हेमू कलानी अपने साथियों को भगाने में सफल रहे।

ब्रिटिश हुकूमत के अधिकारियों ने जेल में हेमू कालानी पर काफी जुल्म किया लेकिन उन्होंने अपने साथ ही योजना में शामिल अपने क्रांतिकारी मित्रों के नाम अंग्रेजी हुकूमत को नहीं बताएं।

हेमू कलानी को अंग्रेजी हुकूमत के अफसर ने बर्फ की सिल्ली पर लिटा कर कोड़े से मार कर उनके शरीर को छलनी छलनी कर दिया तथा उनके जख्मों में नमक भरकर कई बार उन पर कोड़े बरसाए लेकिन हेमू कलानी ने अपने साथियों के नाम नहीं बताए और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे।

रेल पटरी की फिश प्लेट खोलने के आरोप में हेमू को सक्खर न्यायालय ने उम्र कैद की सजा सुनाई

बाद में न्यायालय ने फैसले की नकल हैदराबाद सिंध को को भेज दिया जब हैदराबाद के मुख्य ब्रिटिश न्यायाधीश ने उस फैसले को पढ़ा तब हेमू कलानी को कोर्ट में लाया गया लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के न्यायाधीश कर्नल रिचर्डसन ने उस फैसले को बरकरार रखा।

हेमू कलानी न्यायाधीश कर्नल रिचर्ड्सन से 3 फीट की दूरी पर थे और फैसला सुनने के बाद इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे और ब्रिटिश न्यायाधीश कर्नल रिचर्ड्सन के मुंह पर थूक दिया।

यह खबर देश में आग की तरह फैल गई उसके बाद हैदराबाद सिंध कोर्ट ने हेमू कालानी की उम्र कैद की सजा को फांसी में तब्दील कर दिया।

फांसी से पहले हेमू कलानी की मां जेडी भाई उनसे मिलने के लिए जेल में आई और उन्होंने कहा कि मुझे अपने बेटे पर गर्व है जो भारत माता को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे रहा है यह कहते हुए शिवा बिल्कुल भी नहीं रोई जिसे देख कर सभी जेल में बंद कैदी हैरान रह गए।

हेमू कलानी ने जेल में अपनी मां से यह वचन लिया और कहा कि आप और पिताजी आजादी के आंदोलन को उस समय तक मत रोकना जब तक देश को आजादी ना मिल जाए।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पहली बार हेमू कलानी के लिए रोए और उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को फांसी की सजा माफ करने के लिए पत्र लिखा लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने महात्मा गांधी की अर्जी को नकार दिया तथा 21 जनवरी 1943 को भारत मां के सपूत को फांसी पर लटका दिया।

फांसी से पहले हेमू कलानी इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाकर हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए।

सन 1998 में भारत सरकार ने संसद भवन में हेमू कलानी की प्रतिमा को स्थापित किया इससे पहले 1982 में हेमू कलानी पर एक डाक टिकट जारी किया गया जिसका विमोचन तत्कालीन प्रधानमंत्री ने किया था।

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आजादी के महानायक अनंत लक्ष्मण कन्हेंरे की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle of Anant Laxman Kanhere

आजादी के महानायक एवं ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जहर भरे लेख लिखने वाले देसी क्रांतिकारी युवा अनंत लक्ष्मण कन्हेरे का जन्म सन 1891 में मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ था।
अनंत लक्ष्मण के पूर्वज महाराष्ट्र के रत्नागिरी के निवासी थे उनकी प्रारंभिक शिक्षा मध्य प्रदेश के इंदौर में हुई उसके बाद वह अपने आगे की पढ़ाई के लिए अपने मामा के पास औरंगाबाद महाराष्ट्र चले गए।
उस दौर में देश में दो तरह की राजनीतिक विचारधाराएं पैदा हो रही थी एक तरफ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेश अपने प्रस्ताव के द्वारा भारत वासियों के लिए अधिक से अधिक अधिकारों की मांग कर रहे थे और दूसरी तरफ कुछ क्रांतिकारी विचारों के युवक थे जो यह मानते थे कि शास्त्रों के द्वारा विद्रोह करने पर ही अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ जा सकता है।

अंग्रेजी हुकूमत हिंदू और मुसलमानों में मतभेद पैदा करके उन्हें आपस में लड़ाना चाहती थी इसी नियत से 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया गया इसने क्रांतिकारी आंदोलनों को और आगे बढ़ाया कथा क्रांतिकारी आंदोलनों को इस विभाजन से अपनी ताकत मिली।

कुछ युवकों ने महाराष्ट्र में एक संगठन बनाया जिसका नाम अभिनव भारत रखा और वह इस संगठन के माध्यम से देश भर में क्रांति की भावनाओं को फैलाने लगे।

प्रखर राष्ट्रवादी विनायक सावरकर और गणेश सावरकर अभिनव भारत संगठन के प्रमुख व्यक्ति थे और अनंत लक्ष्मण भी इस संगठन में शामिल हो गए ताकि देश में अधिक से अधिक लोगों में क्रांति की ज्वाला उत्पन्न हो और देश से अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से समाप्त किया जाए।

अभिनव भारत के प्रमुख गणेश सावरकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अक्सर लेख प्रकाशित किया करते थे सन 1960 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लेख प्रकाशित करने के आरोप में गणेश सावरकर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

गणेश सावरकर को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाने के बाद अभिनव भारत संगठन के कार्यकर्ता और देश को अंग्रेजो के चुंगल से मुक्त कराने वाले क्रांतिकारी उत्तेजित हो गए तथा उन्होंने गणेश सावरकर के आजीवन कारावास का बदला लेने का निश्चय किया।

बदला ले ले काजिमा अनंत लक्ष्मण ने अपने ऊपर लिया और नासिक जेल के जिलाधिकारी Jackson जैकसन को मौत के घाट उतारने का प्रण किया।

अभिनव भारत संगठन के सदस्यों ने पिस्टल का प्रबंध किया और 21 दिसंबर 1909 को जब नासिक जेल का जिलाधिकारी जैकसन एक मराठी नाटक देखने के लिए आ रहा था तभी अनंत लक्ष्मण ने उसे नाटक घर के प्रवेश द्वार पर ही अपनी गोलियों से निशाना बनाकर उसे ढेर कर दिया।

जैक्सन की हत्या के बाद ब्रिटिश पुलिस ने लगातार कई स्थानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की अनेकों गिरफ्तारियां की और कई मुकदमे चले ।

जैकसन के हत्या के आरोप में अनंत लक्ष्मण, विनायक देशपांडे और धोंडो केशव कर्वे को फांसी की सजा सुनाई गई।

एक दूसरे मुकदमे में 27 लोगों को सजा सुनाई गई जिसमें विनायक सावरकर को आजीवन कारावास की सजा हुई तथा अनंत लक्ष्मण कण्हेरे को 11 अप्रैल 1910 को मात्र 19 वर्ष की अवस्था में फांसी पर लटका दिया गया।

अनंत लक्ष्मण कन्हेरे ने मत 19 वर्ष की अवस्था में फांसी पर झूल कर भारत मां के लाल ने इतिहास में अपना नाम अमर कर दिया।

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प्रसिद्ध क्रांतिकारी अंबिका चक्रवर्ती की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle of Ambika Chakravarty

प्रसिद्ध क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट नेता अंबिका चक्रवर्ती का जन्म सन 1892 में म्यामार में हुआ था कुछ सालों बाद उनका परिवार बंगाल के चटगांव में आकर रहने लगा।

अमिता चक्रवर्ती बचपन से ही बड़े निर्भीक और साहसी व्यक्ति थे।
अंबिका चक्रवर्ती में बचपन से ही देश भक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी वह क्रांतिकारी विचारों को सुनना बेहद पसंद करते थे।
बंगाल के चटगांव आने के बाद उनके क्रांतिकारी विचारों और कार्यों की वजह से कांग्रेसी नेताओं से उनका घनिष्ठ संबंध बन गया किसकी वजह से कांग्रेस नेताओं ने उन्हें बंगाल के चटगांव समूह का प्रमुख नेता बना दिया।
अंबिका चक्रवर्ती स्वामी विवेकानंद के विचारों से काफी प्रभावित थे।
कुछ क्रांतिकारियों से मिलने के बाद अंबिका चक्रवर्ती का विचार देश को स्वतंत्र कराने की ओर तब्दील हो गया और उनके  क्रांतिकारी कार्यों की वजह से सन 1924 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन्हें 4 वर्षों तक जेल में रखकर यातनाएं दी गई बाद में सन 1928 में  उन्हें जेल से रिहा किया गया ।
उन्होंने अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर चटगांव को अंग्रेजों के चंबल से मुक्त कराने की एक योजना बनाई तथा इस योजना को पूरा करने के लिए उन्होंने दो दलो का गठन किया।
अमिता चक्रवर्ती चाहते थे कि अंग्रेजों के हथियारों को उनसे छीन कर उनको यहां से भगा दिया जाए इसी इरादे से उनके द्वारा बनाए गए एक दल ने टेलीफोन और तार घर पर कब्जा किया था दूसरे ने शस्त्रागार अपने कब्जे में लिया लेकिन अंग्रेज अधिकारी काफी चला थे उन्हें इस बात की भनक पहले सी लग गई थी और उन्होंने अपने हथियार और कारतूस कहीं और छिपा कर दिए थे।

शस्त्रागार अपने कब्जे में लेने के बाद जो हथियार अंबिका चक्रवर्ती के दल के हाथ लगे वह बेकार साबित हुए।
जब तक अंग्रेज अधिकारियों को इस बात की भनक लगती तब तक अंबिका चक्रवर्ती अपने साथियों को लेकर अपने दल को पुनः संगठित करने के इरादे से जलालाबाद की पहाड़ियों पर चले गए अंग्रेजी हुकूमत मेक कार्यरत पुलिस वालों को इसकी भनक लग गई और अंग्रेजों ने पहाड़ी पर आक्रमण कर दिया।
आक्रमण के दौरान अंबिका चक्रवर्ती ने अपने सभी साथियों को वहां से भगा दिया लेकिन पुलिस की गोली से घायल हो गए तथा वह वहां से घसीटते हुए एक गांव में पहुंचे जहां पर गांव वालों ने उनका इलाज किया इसके बाद वे भूमिगत हो गए।
सन 1930 में पुलिस को अंबिका चक्रवर्ती के ठिकाने का पता चला और उन्हें गिरफ्तार कर उम्र कैद की सजा दे दी गई उसके बाद उन्हें अंडमान भेज दिया गया।
अंडमान में साम्यवादी साहित्य के अध्ययन से अंबिका चक्रवर्ती के विचार पूरी तरह परिवर्तित हो गया और जेल से बाहर आने के बाद सन 1946 में वह कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए।
पूरा सन 1949 से 1951 तक उन्हें जेल की सजा हुई और 1952 में कम्युनिस्ट उम्मीदवार के रूप में पश्चिम बंगाल विधान सभा के सदस्य चुने गए।
6 मार्च सन 1962 को इस महान वीर और सासी देशभक्त की एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया।
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आपातकाल के दौरान इंदिरा का विरोध करने वाले जयप्रकाश नारायण की जीवनी और उनके संघर्ष Biography of Jayprakash Narayan who opposed Indira Gandhi during Emergency in India

एकता में अनेकता वाले लोकतांत्रिक देश भारत में जब भी कभी लोकतंत्र पर किसी तरह के खतरे की आशंका हुई है तब तक देश में बड़ी बड़ी क्रांतियां हुई है और लोकतंत्र को खतरों से मुक्त कराया गया है।
और ऐसे खतरों से लड़ने के लिए कई महान सपूत इस पावन धरती पर अवतरित हुए इसी में से एक थे जय प्रकाश नारायण जिन्होंने इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल को एक लोकतांत्रिक खतरा बताया और सरकार के फैसले का खुलकर विरोध किया।

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1903 को सारण जिले के सिताबदियारा नामक गांव में हुआ था जो घाघरा नदी के तट पर स्थित था जो हमेशा बाढ़ की चपेट में रहता था।

इसी वजह से जय प्रकाश नारायण का परिवार वहां से हटकर कुछ दूर आगे चला गया स्थान अप उत्तर प्रदेश में आता है।

जयप्रकाश नारायण की रुचि बचपन से ही पढ़ने लिखने में थी जब जयप्रकाश नारायण मात्र 9 वर्ष के थे तब वे पटना आए और सातवीं कक्षा में अपना दाखिला कराया।

मत 9वर्ष की आयु में जयप्रकाश नारायण उस समय की प्रसिद्ध पत्रिकाएं सरस्वती, प्रभा और प्रताप को पढ़ना शुरू कर दिए थे।

पटना में अध्ययन के दौरान उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र और मैथिलीशरण गुप्त जैसे बड़े लेखकों की रचनाओं को पढ़ना शुरू कर दिया और उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता के श्री कृष्ण के अनमोल वचनों का अध्ययन किया।
सन 1918 जय प्रकाश नारायण ने अपनी स्कूली शिक्षा समाप्त की और इन्हें स्टेट पब्लिक मैट्रिकुलेशन एग्जामिनेशन का सर्टिफिकेट दिया गया।

जब जयप्रकाश नारायण मात्र 18 साल के थे तभी उनका विवाह बृज किशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती से हो गया प्रभावती उस समय मात्र 14 साल की थी।

विवाह के बाद जय प्रकाश नारायण पटना में रहने लगे क्योंकि वह पटना में ही कार्य कर थे जिसकी वजह से पत्नी के साथ रहना उनके लिए संभव नहीं था।

उसी दौरान महात्मा गांधी ने उनकी पत्नी को न्योता दिया और में महात्मा गांधी के आश्रम में सेवा करने लगी।
महात्मा गांधी ने उसी दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जारी किए गए रौलट एक्ट के खिलाफ असहयोग आंदोलन कर रहे थे इस आंदोलन में मौलाना आजाद ने एक बेहद शानदार भाषण दिया जिससे लोग प्रभावित हो गए।

जयप्रकाश नारायण मौलाना आजाद के तर्कों से काफी प्रभावित हुए जिसमें मौलाना आजाद ने लोगों से अंग्रेजी हुकूमत की शिक्षा को त्यागने का आग्रह किया था जयप्रकाश नारायण आंदोलन से लौटकर पटना आए और उस समय उनकी परीक्षा मात्र 20 दिन बची थी और उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया तथा बाद में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद द्वारा स्थापित कॉलेज बिहार विद्यापीठ में अपना दाखिला कराया।

बिहार विद्यापीठ से पढ़ाई पूरी करने के बाद जयप्रकाश नारायण ने अमेरिका से शिक्षा प्राप्त करने की ठानी और मात्र 20 वर्ष की आयु में वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका रवाना हो गए।
जयप्रकाश नारायण 8 अक्टूबर 1922 को कैलिफोर्निया पहुंच गए लेकिन उनका दाखिला जनवरी 1923 में बर्कले विश्वविद्यालय में हुआ।

जयप्रकाश नारायण के पास अपनी फीस चुकाने के लिए पैसे नहीं थे और उन्हें किसी प्रकार की कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली थी इसलिए जय प्रकाश नारायण ने एक मिल फैक्ट्री मैं काम करना शुरू कर दिया इसके साथ उन्होंने होटलों में बर्तन धोने का काम और गैरेज में गाड़ी बनाने का भी कार्य किया।
बावजूद इसके उन्हें शिक्षा में काफी कठिनाई आई क्योंकि बर्कली की फीस दोगुनी बढ़ा दी गई थी जिसके बाद इन्हें बर्कली विश्वविद्यालय छोड़कर यूनिवर्सिटी आफ लोया में अपना दाखिला कराना पड़ा।

पढ़ाई करते समय है मार्क्स के दास कैपिटल पढ़ने का मौका मिला। इसी समय इन्हें रूस क्रांति की के सफलता की खबर मिली और जयप्रकाश नारायण इससे काफी प्रभावित हुए।

सन 1929 में जयप्रकाश नारायण अमेरिका से उच्च शिक्षा प्राप्त करके भारत वापस आ गए उस दौरान उनकी पूरी विचारधाराएं मार्क्सवादी हो गई थी और भारत आकर उन्होंने राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी जॉइन कर लिया।

जब सन 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ था उस समय ब्रिटिश हुकूमत ने इन्हें जेल में डाल दिया जेल में इनकी मुलाकात प्रखर राष्ट्रवादी और समाजवादी राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन अशोक मेहता युसूफ देसाई सीके नारायण स्वामी पवन सिंहा मीनू मस्तानी तथा और कई राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से मुलाकात हुई। इस मुलाकात की वजह से कांग्रेसमें एक वामपंथी दल का निर्माण हुआ इसे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गया जिसके अध्यक्ष आचार्य नरेंद्र देव और महासचिव जयप्रकाश नारायण थे।

भारत छोड़ो आंदोलन के समय सन 1942 में इन नेताओं को गिरफ्तार किया गया और हजारीबाग के जेल में रखा गया इस दौरान जयप्रकाश नारायण अपने साथियों सूरज नारायण सिंह गुलाब चंद गुप्ता राम आसरे मिश्रा शालिग्राम सिंह योगेंद्र शुक्ला आदि से मिलकर देश की आजादी के लिए आंदोलन की योजनाएं बनाने लगे।

जयप्रकाश नारायण अपने आंदोलनों की वजह से काफी प्रसिद्ध होने लगे तथा बाद में इन्हें ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन का अध्यक्ष बनाया गया जो कि भारत का सबसे बड़ा श्रमिक दल था इसके अध्यक्ष पद पर है स्पोर्ट्स तक कार्यरत रहे।

भारत की आजादी के 27 वर्ष बाद जब देशवासी भ्रष्टाचार भुखमरी और महंगाई से ग्रस्त थे और देश को एक बड़ी क्रांति की आवश्यकता थी उस समय जय प्रकाश नारायण ने सन 1974 में बिहार के छात्रों के साथ मिलकर छात्र आंदोलन की शुरुआत की जो एक विकराल रूप ले लिया और छात्रों के साथ साथ हम लोग इस आंदोलन से जुड़ने लगे जिसे बाद में बिहार आंदोलन कहा गया इस आंदोलन को जय प्रकाश नारायण ने शांतिपूर्ण संपूर्ण क्रांति नाम दिया।

जब देश में इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 आपातकाल की घोषणा की थी उस दौरान इलाहाबाद कोर्ट ने इंदिरा गांधी को एल्क्टोरल कानून को तोड़ने का दोषी पाया और इसी को मुद्दा बनाकर जयप्रकाश नारायण इंदिरा गांधी के साथ साथ अन्य कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से भी इस्तीफे की मांग करने लगे।

जयप्रकाश नारायण ने इसके बाद सरकार के विरोध में रामलीला मैदान में लाखों लोगों को संबोधित करते हुए वरिष्ठ राष्ट्रवादी कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता सिंहासन खाली करो जनता आती है को दोहराया जिसके बाद इन्हें पुणे गिरफ्तार कर लिया गया और चंडीगढ़ के जेल में रखा गया।

इसी दौरान बिहार में भीषण बाढ़ आ गई और जयप्रकाश नारायण सरकार से 1 माह के लिए पैरोल की मांग करने लगे ताकि वे बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का जायजा ले सके लेकिन ऐसा नहीं हुआ और बीच में उनकी तबीयत खराब होने लगी।

तबीयत ज्यादा खराब होने के बाद 12 नवंबर को इन्हें जेल से रिहा कर दिया गया उसके बाद उन्हें डायग्नोसिस के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया और जहां पता चला कि उन्हें किडनी संबंधित बीमारी है जिसके बाद उन्हें हमेशा डायग्नोसिस का सहारा लेना पड़ा।

कुछ समय बाद नोबेल पुरस्कार प्राप्त नोएल बेकर ने फ्री जेपी कैंपस का नेतृत्व किया जिसका मुख्य उद्देश्य जयप्रकाश नारायण को जेल से मुक्त कराना था।

18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने देश से आपातकालीन हटा दी और चुनाव की घोषणा की गई उसी दौरान जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी का गठन किया गया और जनता पार्टी ने चुनाव में विजई हुई तथा देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार आई।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी ने अपार सफलता हासिल की बावजूद इसके जयप्रकाश नारायण राजनीतिक पद से दूर रहें और मोरारजी देसाई को भारत का प्रधान मंत्री मनोनीत किया।

जयप्रकाश नारायण उच्च नीच कि भेदभाव ना से परे उन्नति की बात करने वाले आदर्श व्यक्ति थे उनके व्यक्तित्व में एक अद्भुत तेज था।

8 अक्टूबर सन 1979 को बिहार के पटना में भारत मां के अमर सपूत हमेशा के लिए चिर निद्रा में सो गया।

देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सन 1998 में लोकनायक और प्रखर समाजवादी जय प्रकाश नारायण को मरणोपरांत भारत के सरोज सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

महान राष्ट्रवादी कवि रामधारी सिंह दिनकर ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के बारे में लिखा है।


है जय प्रकाश व नाम जिसे इतिहास आदर देता है।बढ़कर जिस के पद चिन्हों की उन पर अंकित कर देता है।।कहते हैं जो यह प्रकाश को नहीं मरण से जो डरता है।ज्वाला को बुझते देख कुंड में कूद स्वयं जो पड़ता है।।