अमर शहीद खुदीराम बोस का जीवन परिचय और उनके संघर्ष Khudiram Bose Biography and Struggle

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं बात 30 अप्रैल उन्नीस सौ आठ की है मुजफ्फरपुर बिहार की रात्रि करीब 8:30 बजे थे और रात के अंधेरे में 18 साल का लड़का दुश्मन के आने का इंतजार कर रहा था जिसके एक हाथ में बम और दूसरे हाथ में पिस्तौल थी अगर तुम ने साथ नहीं दिया तो हाथ में पिस्तौल होनी चाहिए दुश्मन को उड़ाने के लिए.
दुश्मन अंग्रेज मजिस्ट्रेट था जिसने अपने कलकत्ता की पोस्टिंग के दौरान हिंदुस्तानियों पर बेशुमार जुल्म किए थे और यह 19 साल का लड़का था अमर शहीद खुदीराम बोस.

बस कुछ ही दिन पहले मुजफ्फरपुर आए थे हरेन पंड्या के नाम से मोती झील इलाके की एक धर्मशाला में ठहरे थे. दुश्मन के हर एक गतिविधि पर उनकी नजर थी.  कहां जाता है किधर जाता है जो जाता तो क्यों जाता है ?
 खुदीराम बोस की और जैसे ही दुश्मन की बग्गी आई और खुदीराम बोस की निगाह पर आई.
खुदीराम बोस का हाथ चल पड़ा बिना रूके बिना सोचे और अपने निशाने पर लगा और दुश्मन की बग्गी हवा में उड़ते हुए गिर पड़ी.
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा.

 खुदीराम बोस को बचपन से ही बमों से खेलने का शौक था कॉलेज में जब बाकी बच्चों के सवाल गणित या विज्ञान से जुड़े होते थे उस वक्त खुदीराम बोस अपने टीचर से पूछ रहे होते थे कि पिस्तौल कैसे बनती है.

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को हबीबपुर मिदनापुर जिला बंगाल में हुआ था, खुदीराम बोस एक युवा क्रांतिकारी थे जिनकी शहादत ने पूरे भारतवर्ष में क्रांति की एक लहर पैदा कर दी खुदीराम बोस देश की आजादी के लिए मात्र 19 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ गए.
उनके पिता का नाम तीन लोक के नाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मी पूजा देवी था.

जब बंगाल विभाजन के विरोध में लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे उस दौरान कोलकाता के मजिस्ट्रेट किंग्स फोर्ड ने भारतीयों को क्रूर दंड दिया था. इसी वजह से क्रांतिकारियों ने King जोड़ को को मारने का निश्चय किया और इस कार्य के लिए खुदीराम बोस ओर प्रफुल्ल कुमार का चयन किया. खुदीराम बोस मजिस्ट्रेट के घर के सामने बम लेकर उसका इंतजार कर रहे थे और उन्होंने मजिस्ट्रेट की बग्गी पर बम फेंक दिया लेकिन बग्गी में मजिस्ट्रेट नहीं बल्कि दो यूरोपियन महिलाएं थी.
इसी आरोप में खुदीराम बोस को गिरफ्तार किया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया फिर उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई 11 अगस्त 1968 को उन्हें फांसी दे दी गई उसमें उनकी उम्र करीब 19 साल की थी.
खुदीराम बोस इतने नृत्य की हाथ में गीता लेकर खुशी-खुशी फांसी पर चढ़ गए उनकी इन्हीं निडरता वीरता और शहादत ने उन्हें इतना लोकप्रिय कर दिया कि बंगाल के एक खास जुलाहे ख़ास जुलाहे वर्ग के हुए अनुकरणीय हो गए.

खुदीराम बोस की फांसी के बाद कई दिनों तक स्कूल कॉलेज बंद रहे विद्यार्थियों तथा देशवासियों ने कई दिनों तक सुकून आया

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