बिपिन चंद्र पाल की जीवनी और उनके संघर्ष Biography and Struggle of Vipin Chandra Pal

बिपिन चंद्र पाल एक महान भारतीय क्रांतिकारी थे देश की आजादी का बुनियादी ढांचा तैयार करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

विपिन चंद्र पाल एक ऐसी तिकड़ी का हिस्सा थे जिसने अपने तीखे प्रहार से विदेशी हुकूमत की न्यू हिला दी. वह लाल बाल पाल लाला लाजपत राय बाल गंगाधर तिलक एवं बिपिन चंद्र पाल तिकड़ी का हिस्सा थे इन्हें भारत में क्रांतिकारी विचारों का पितामह कहा जाता है.

जब 1950 में बंगाल का विभाजन हो रहा था तब बंगाल विभाजन के विरोध में बिपिन चंद्र पाल ने विदेशी हुकूमत के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन किया और इस आंदोलन को भारी जनसमर्थन मिला.

अपने क्रांतिकारी विचारों से विपिन चंद्र पाल ने अंग्रेजी हुकूमत को परेशान कर दिया था भारत को स्वतंत्र कराने में बिपिन चंद्र पाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

बिपिन चंद्र पाल का जन्म 7 नवंबर 1858 को बंगाल के हबीबगंज जिले के कुल गांव में हुआ था जो वर्तमान समय में बांग्लादेश में है उनके पिता का नाम राम चंद्र पाल और माता का नाम नारायणी देवी था उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा चर्च मिशन सोसाइटी कॉलेज से पूरी की.




शिक्षा पूरी करने के बाद इन्होंने एक विधवा से विवाह किया जो उस समय एक दुर्लभ बात थी.

बिपिन चंद्र पाल ने कांग्रेस की सदस्यता ली और बहुत ही कम समय में एक प्रसिद्ध वक्ता के रूप में मशहूर हो गए जब कांग्रेस का तीसरा अधिवेशन हो रहा था तब बिपिन चंद्र पाल और सुरेंद्र नाथ बनर्जी बंगालियों का प्रतिनिधित्व करते हुए यह प्रस्ताव रखा कि अस्त्र कानून हटा लिया जाए और उनकी इन भाषणों ने कांग्रेस में खलबली मचा दी.

बिपिन चंद्र पाल के भाषणों का परिणाम यह हुआ कि उनके इस भाषण से अंग्रेजी हुकूमत भी डर गई

एक भाषण के दौरान बिपिन चंद्र पाल ने यह कहा था कि कोई किसी को स्वराज्य दे नहीं सकता अगर कांग्रेस मुझे यह कहे कि स्वराज्य ले लो तो मैं उस स्वराज्य को ठुकरा दूंगा क्योंकि मैं जिस चीजों का उपार्जन नहीं कर सकता उसको लेने का मुझे कोई हक नहीं है. बिपिन चंद्र पाल ने ताकि हम अपनी समस्त शक्तियों को इस तरह लगाएंगे कि हमारे विरोधी शक्ति झुककर हमारी बात मान जाएगी.

जब बंगाल में दमनचक्र जोरों से चल रहा था उसी समय उग्र राष्ट्रीय पत्र संध्या के संस्थापक ब्रह्म बांधव उपाध्याय और वंदे मातरम के संपादक अरविंद को विदेशी हुकूमत ने पकड़ कर उन पर मुकदमा कर दिया तथा न्यायालय ने बिपिन चंद्र पाल से यह कहा कि वह अरविंद के खिलाफ गवाही दे जब बिपिन चंद्र पाल ने अरविंद के खिलाफ गवाही देने से मना किया तब अदालत ने बिपिन चंद्र पाल पर अदालत की मानहानि का मुकदमा चला दिया लेकिन इसके बावजूद बिपिन चंद्र पाल तनिक नहीं झुके.

अदालत की मानहानि के मुकदमे में बिपिन चंद्र पाल को 6 महीने की जेल की सजा हुई तब बिपिन चंद्र पाल ने कहा कि मैं किसी भी देश भक्त के खिलाफ अदालत में गवाही नहीं दूंगा चाहे मुझे फांसी पर ही क्यों न लटका दिया जाए.

सन 1919 की बात है बिपिन चंद्र पाल कांग्रेस के शिष्टमंडल में विदेश गए तथा उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की वकालत की.

सन 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन में बिपिन चंद्र पाल ने हिस्सा लिया उनकी लिखी गई किताबें है जिन किताबों में उन्होंने उस दौर के राजनीति की व्याख्या की है.

बिपिन चंद्र पाल भारतीय सभ्यता और संस्कृत के अच्छे विद्वान थे सन 1932 में 10 मई को उनका देहांत हो गया.

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